1 0 Tag Archives: जैन सूत्र
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गर्भ में आते हैं

गर्भ में आते हैं

माई पमाई पुण एइ गब्भं

मायावी और प्रमादी फिर से गर्भ में आते हैं

गर्भ में आने का अर्थ है – जन्म धारण करना और जन्म धारण करने का अर्थ है – एक दिन सब छोड़ कर मर जाना अर्थात् जन्म-मरण के चक्कर में पड़े रहना| Continue reading “गर्भ में आते हैं” »

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लाभ और लोभ

लाभ और लोभ

जहा लाहो तहा लोहो, लाहा लोहो पवड्ढइ

ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों त्यों लोभ होता है और लाभ से लोभ बढ़ता रहता है

स्वार्थ-सिद्धि के लिए प्रत्येक संसारी जीव निरन्तर प्रयत्न करता रहता है| इस प्रयत्न में कभी उसे सफलता प्राप्त होती है और कभी विफलता|

सफलता से उत्साह बढ़ता है और विफलता से वह नष्ट हो जाता है| Continue reading “लाभ और लोभ” »

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थूक न चाटें

थूक न चाटें

से मइमं परिय मा य हु लालं पच्चासी

बुद्धिमान साधक लार चाटने वाला न बने अर्थात् परित्यक्त भोगों की पुनः कामना न करे

जब आँखें खोलकर साधक दुनिया में यह देखता है कि लोग भोग से रोग के शिकार बनते हैं – वैद्यों और डाक्टरों के द्वार खटखटाते हैं – उनके लम्बे-लम्बे बिल चुकाते हैं; फिर भी रोगों के चंगुल से वे अपनी पूरी तरह पिण्ड नहीं छुड़ा पाते, एक के बादे एक कोई-न-कोई रोग शरीर में उत्पन्न होता ही रहता है; Continue reading “थूक न चाटें” »

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असंविभागी

असंविभागी

असंविभागी न हु तस्स मोक्खो

जो संविभागी नहीं है अर्थात् प्राप्त सामग्री को साथियों में बॉंटता नहीं है, उसकी मुक्ति नहीं होती

जो अकेला ही प्राप्त सामग्री का भोग करता है, उसे बहुत कम सुख मिलता है| इसके विपरीत जो व्यक्ति दूसरे साथियों को बॉंट-बॉंट कर सबके साथ बैठ कर अपनी प्राप्त सामग्री भोगता है, उसे अधिक सुख का अनुभव होता है| Continue reading “असंविभागी” »

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समय को पहचानिये

समय को पहचानिये

अणभिक्कंतं च वयं संपेहाए,
खणं जाणाहि पंडिए

हे बुद्धिमान साधक! अवशिष्ट आयु को देखते हुए समय को पहचान-अवसर का मूल्य समझ

हीरा भी अमूल्य है और पत्थर भी; परन्तु दोनों की अमूल्यता में महान अन्तर है| हीरा इसलिए अमूल्य है कि उसका कोई मूल्य ही नहीं है| समय की अमूल्यता भी हीरे की तरह है| Continue reading “समय को पहचानिये” »

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सच्ची शिक्षा

सच्ची शिक्षा

अट्ठजुत्ताणि सिक्खिज्जा,
निरट्ठाणि उवज्जए

निरर्थक शिक्षा छोड़कर सार्थक शिक्षा ही ग्रहण करें

कुछ विचारकों का मत है कि कला, कला के लिए है और कुछ कला को कल्याण के लिए मानते हैं| पहले विचारकों के अनुसार कला का कोई उद्देश्य होने पर कला मर जायेगी और दूसरे विचारकों के अनुसार कला का यदि कोई अच्छा उद्देश्य न हुआ तो कला दूसरों को मार डालेगी| Continue reading “सच्ची शिक्षा” »

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राग द्वेष के कारण

राग द्वेष के कारण

रागस्स हेउं समणुमाहु,
दोसस्स हेउं अमणुमाहु

मनोज्ञ शब्दादि राग के और अमनोज्ञ द्वेष के कारण कहे गये हैं

शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श – ये पॉंचों राग के भी कारण हैं और द्वेष के भी|

कोमल प्रशंसात्मक शब्द हमें अच्छे लगते हैं और कठोर निन्दात्मक शब्द बुरे| Continue reading “राग द्वेष के कारण” »

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राग द्वेष का क्षय

राग द्वेष का क्षय

रागस्स दोसस्स य संखएणं
एगंतसोक्खं समुवेइ मोक्खं

राग-द्वेष के क्षय से जीव एकान्तसुखस्वरूप मोक्ष को प्राप्त करता है

राग अपने को रुलाता है और द्वेष दूसरों को | रोना किसे अच्छा लगता है ? किसीको नहीं; तब भला रुलाना क्यों अच्छा लगना चाहिये ? हँसने-हँसाने में अर्थात् स्वयं प्रसन्नचित्त रहने और दूसरों को प्रसन्नता वितरित करने में ही जीवन की सफलता निहित है| Continue reading “राग द्वेष का क्षय” »

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सद्गुण साधना

सद्गुण साधना

बाहाहिं सागरो चेव,
तरियव्वो गुणोदहिं

सद्गुण-साधना का कार्य भुजाओं से समुद्र तैरने के समान है

पहले नावों से समुद्र-यात्राएँ की जाती थीं| अब बड़े-बड़े जहाज बन गये हैं, जिनमें बैठकर यात्री एक देश से दूसरे देश में आसानी से चले जाते हैं| जबसे वायुयान बनने लगे हैं, जलयानों का भी महत्त्व घट गया है| अब बीच में पड़नेवाले सुविशाल समुद्रों की भी पर्वाह न करके लोग वायुयानों के द्वारा ही परदेश जा पहुँचते हैं| Continue reading “सद्गुण साधना” »

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विज्ञान और धर्म

विज्ञान और धर्म

विण्णए समागम्म धम्मसाहणमिच्छिउं

धर्म के साधनों का विज्ञान से समन्वय करना चाहिये

धर्म के साधनों का विज्ञान से समझौता होना चाहिये और विज्ञान के साधनों का धर्म से| इस प्रकार धर्म से विज्ञान का सम्बन्ध जुड़ना चाहिये; दोनों का समन्वय होना चाहिये| दोनों परस्पर एक-दूसरे के पूरक बनें – सहयोगी बनें, विरोधी न रहें| इसकी जिम्मेदारी वैज्ञानिकों पर भी है और धर्मात्माओं पर भी| Continue reading “विज्ञान और धर्म” »

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