आत्महित का अवसर मुश्किल से मिलता है
आत्महित का अवसर
अत्तहियं खु दुहेण लब्भइ
इस संसार में पत्थर बहुत हैं, हीरे कम-कुत्ते बहुत हैं, हाथी कम-सियार बहुत हैं, सिंह कम – नीम के पेड़ बहुत हैं, आम के कम – कङ्कर बहुत हैं, मोती कम – दुर्जन बहुत हैं, सज्जन कम| Continue reading “आत्महित का अवसर” »
दुरुक्त कैसा होता है ?
वाया दुरुत्ताणि दुरुद्धराणि,
वेराणुबंधीणि महब्भयाणि
वेराणुबंधीणि महब्भयाणि
वाणी से बोले हुए दुष्ट और कठोर वचन जन्मजन्मान्तर के वैर और भय के कारण बन जाते हैं
विरक्त साधक
विरता हु न लग्गंति,
जहा से सुक्कगोलए
जहा से सुक्कगोलए
मिट्टी के सूखे गोले के समान विरक्त साधक कहीं भी चिपकता नहीं है
धर्माचार्य को वन्दन
जत्थेव धम्मायरियं पासेज्जा,
तत्थेव वंदिज्जा नमंसिज्जा
तत्थेव वंदिज्जा नमंसिज्जा
जहॉं कहीं भी धर्माचार्य दिखाई दें, वहीं उन्हे वन्दना नमस्कार करना चाहिये
अनुभव से सच्चाई खोजो
अप्पणा सच्चमेसेज्जा
स्वयं सत्यान्वेषण करना चाहिये
श्रुतधर्म एवं चारित्रधर्म
दुविहे धम्मे-सुयधम्मे चेव चरित्तधम्मे चेव
धर्म के दो रूप हैं – श्रुतधर्म (तत्त्वज्ञान) और चारित्रधर्म (नैतिकता)
गुणाकांक्षा
कङ्खे गुणे जाव सरीरभेऊ
जब तक शरीरभंग (मृत्यु) न हो तब तक गुणाकांक्षा रहनी चाहिये
विषयों की तो सभी प्राणी कामना करते रहते हैं; किंतु विवेकी व्यक्ति गुणों की कामना करते हैं| Continue reading “गुणाकांक्षा” »
खून का दाग खून से नहीं धुलता
रुहिरकयस्स वत्थस्स रुहिरेणं चेव
पक्खालिज्जमाणस्स णत्थि सोही
पक्खालिज्जमाणस्स णत्थि सोही
रक्त-सना वस्त्र रक्त से ही धोया जाये तो वह शुद्ध नहीं होता
ममता का बन्धन
ममत्तं छिंदए ताए, महानागोव्व कंचुयं
आत्मसाधक ममत्व के बन्धन को तोड़ फेंके; जैसे महानाग कञ्चुक को उतार देता है
चक्षु चाहिये
सूरोदये पासति चक्खुणेव
सूर्य के उदय होने पर भी आँख से ही देखा जा सकता है


















