जत्थेव धम्मायरियं पासेज्जा,
तत्थेव वंदिज्जा नमंसिज्जा
तत्थेव वंदिज्जा नमंसिज्जा
जहॉं कहीं भी धर्माचार्य दिखाई दें, वहीं उन्हे वन्दना नमस्कार करना चाहिये
जहॉं कहीं भी धर्माचार्य दिखाई दें, वहीं उन्हे वन्दना नमस्कार करना चाहिये
स्वयं सत्यान्वेषण करना चाहिये
धर्म के दो रूप हैं – श्रुतधर्म (तत्त्वज्ञान) और चारित्रधर्म (नैतिकता)
जब तक शरीरभंग (मृत्यु) न हो तब तक गुणाकांक्षा रहनी चाहिये
विषयों की तो सभी प्राणी कामना करते रहते हैं; किंतु विवेकी व्यक्ति गुणों की कामना करते हैं| Continue reading “गुणाकांक्षा” »
रक्त-सना वस्त्र रक्त से ही धोया जाये तो वह शुद्ध नहीं होता
आत्मसाधक ममत्व के बन्धन को तोड़ फेंके; जैसे महानाग कञ्चुक को उतार देता है
सूर्य के उदय होने पर भी आँख से ही देखा जा सकता है
निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि दुःख कामासक्ति से उत्प होता है
संसार की तृष्णा भयंकर फल देनेवाली एक भयंकर लता है
किये हुए को कृत और न किये हुए को अकृत कहना चाहिये