खणमित्तसुक्खा बहुकालदुक्खा
विषयभोग क्षणमात्र सुख देते हैं, किंतु बहुकाल पर्यन्त दुःख देते हैं
विषयभोग क्षणमात्र सुख देते हैं, किंतु बहुकाल पर्यन्त दुःख देते हैं
अपने किये कर्मों से ही व्यक्ति कष्ट पाता है
भगवती अहिंसा भीतों (डरे हुओं) के लिए शरण के समान है
आयु बीत रही है और युवावस्था भी
आन्तरिक विकारों से ही युद्ध कर, बाह्य युद्ध से तुझे क्या लाभ?
वीर्य को छिपाना नहीं चाहिये
जो बुद्धिमान हैं, उन्हें अपनी बुद्धि का उपयोग दूसरों के झगड़े मिटाने में करना चाहिये| Continue reading “वीर्यको न छिपायें” »
हाथी और कुन्थु में समान ही जीव होता है
मनुष्य में विद्यमान गुण भी चार कारणों से नष्ट हो जाते हैं – क्रोध, ईर्ष्या, अकृतज्ञता और मिथ्या आग्रह
डरना नहीं चाहिये| भीत के निकट भय शीघ्र आते हैं
संयम और तप से आत्मा को भावित (पवित्र) करता हुआ साधक विहार करता है