सर्वथा काया को मोह छोड़ता हूँ – मेरी देह पर कोई परीषह जैसे है ही नहीं
कायोत्सर्ग
वोसिरे सव्वसो कायं, न मे देहे परीसहा
‘काउसग्ग’ एक पारिभाषिक शब्द है, जिसे संस्कृत में ‘कायोत्सर्ग’ कहते हैं| यह शब्द काया+उत्सर्ग से बना है| काया शरीर को कहते हैं और उत्सर्ग त्याग को; परन्तु कायोत्सर्ग का अर्थ ‘शरीर का त्याग’ नहीं है| इसका अर्थ है शरीर के मोह का त्याग| कायोत्सर्ग के बाद ही ध्यान में एकाग्रता आ सकती है| Continue reading “कायोत्सर्ग” »
न भाषा न पांडित्य
न चित्ता तायए भासा
कुओ विज्जाणुसासणं
कुओ विज्जाणुसासणं
विचित्र (लच्छेदार) भाषाएँ भी (दुराचारी की दुर्गति से) रक्षा नहीं कर सकतीं, फिर विद्यानुशासन (पाण्डित्य) की तो बात ही क्या?
सौन्दर्य का नाश
वण्णं जरा हरइ नरस्स रायं
हे राजन्! बुढ़ापा मनुष्य के सौन्दर्य को नष्ट कर देता है
निर्मल, मुक्त एवं सहिष्णु
सारदसलिलं इव सुद्धहियया,
विहग इव विप्पमुक्का,
वसुंधरा इव सव्वफासविसहा
विहग इव विप्पमुक्का,
वसुंधरा इव सव्वफासविसहा
मुनियों का हृदय शरद्कालीन नदी के जल की तरह निर्मल होता है| वे पक्षी की तरह बन्धनों से विप्रमुक्त और पृथ्वी की तरह समस्त सुख-दुःखों को समभाव से सहन करने वाले होते हैं
झुँझलायें नहीं
थोवं लद्धुं न खिंसए
थोड़ा मिलने पर झुँझलाएँ नहीं
सम्यग्दर्शी
सम्मत्तदंसी न करेइ पावं
सम्यग्दर्शी पाप नहीं करता
क्रोध न करें
वुच्चमाणो न संजले
साधक को कोई यदि दुर्वचन कहे; तो भी वह उस पर क्रोध न करे
शंका हो तो न बोलें
जत्थ संका भवे तं तु,
एवमेयं ति नो वए
एवमेयं ति नो वए
जिस विषय में अपने को शंका हो, उस विषय में ‘‘यह ऐसी ही है’’ ऐसी भाषा न बोलें
बुद्धिवाद
पा समिक्खए धम्मं
बुद्धि ही धर्म का निर्णय कर सकती है
सो क्या जाने पीर पराई ?
जे अज्झत्थं जाणइ, से बहिया जाणइ|
जे बहिया जाणइ, से अज्झत्थं जाणइ|
जे बहिया जाणइ, से अज्झत्थं जाणइ|
जो अभ्यन्तर को जानता है, वह बाह्य को जानता है और जो बाह्य को जानता है वह अभ्यन्तर को जानता है


















