अणुविय गेण्हियव्वं
अनुज्ञा लेकर (ही कोई वस्तु) ग्रहण करनी चाहिये
अनुज्ञा लेकर (ही कोई वस्तु) ग्रहण करनी चाहिये
जिसके निकट रह कर धर्म के पद सीखे हों, उसके प्रति विनयपूर्ण व्यवहार रखना चाहिये
साधना में संशय वही करता है, जो मार्ग में घर करना (ठहरना) चाहता है
विद्या और आचरण से ही मोक्ष बताया गया है
विषयभोग क्षणमात्र सुख देते हैं, किंतु बहुकाल पर्यन्त दुःख देते हैं
अपने किये कर्मों से ही व्यक्ति कष्ट पाता है
भगवती अहिंसा भीतों (डरे हुओं) के लिए शरण के समान है
आयु बीत रही है और युवावस्था भी
आन्तरिक विकारों से ही युद्ध कर, बाह्य युद्ध से तुझे क्या लाभ?
वीर्य को छिपाना नहीं चाहिये
जो बुद्धिमान हैं, उन्हें अपनी बुद्धि का उपयोग दूसरों के झगड़े मिटाने में करना चाहिये| Continue reading “वीर्यको न छिपायें” »