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Birth Ceremonies

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अनेकान्तवादी बनें

अनेकान्तवादी बनें

विभज्जवायं च वियागरेज्जा

स्याद्वाद से युक्त वचनों का प्रयोग करना चाहिये

‘स्याद्वाद’ एक दार्शनिक सिद्धान्त है| ‘स्यात्’ का अर्थ अपेक्षा है; इसलिए इसे सापेक्षवाद भी कह सकते हैं| वैसे किसी एक बात का आग्रह न होने से यह ‘अनेकान्तवाद’ के नाम से ही दुनिया में अधिक प्रसिद्ध है| Continue reading “अनेकान्तवादी बनें” »

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शेठ मोतीषा

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ज्ञान का सार

ज्ञान का सार

एवं खु णाणिणो सारं,
जं न हिंसइ किंचणं

अहिंसा या दया एक धर्म है; किन्तु इसका सम्यक् परिपालन करने से पहले ज्ञान होना आवश्यक है

जो व्यक्ति जीवाजीवादि नव तत्त्वों को अच्छी तरह से जान लेता है – इनके स्वरूप को हृदयंगम कर लेता है, वही सच्चा अहिंसक बन सकता है| Continue reading “ज्ञान का सार” »

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सम्यग्दृष्टि में स्थिरता

सम्यग्दृष्टि में स्थिरता

से दिट्ठिमं दिट्ठि न लूसएज्जा

सम्यग्दृष्टि साधक को सत्यदृष्टि का अपलाप नहीं करना चाहिये

जिसकी दृष्टि सम्यक् है, उसे कभी अपनी दृष्टि को शिथिल नहीं करना चाहिये| एक बार जिस व्यक्ति का जैसा दृष्टिकोण बन जाता है, उसे वैसा ही दिखाई देता है| Continue reading “सम्यग्दृष्टि में स्थिरता” »

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सहिष्णुता

सहिष्णुता

पियमप्पियं सव्वं तितिक्खएज्जा

प्रिय हो या अप्रिय-सबको समभाव से सहना चाहिये

सदा प्रिय वस्तुओं का ही संयोग नहीं होता – सर्वत्र प्रशंसा ही प्राप्त नहीं होती – सभी लोक कोमल मीठे वचन ही नहीं बोला करते; किन्तु हमें अनेक बार अप्रिय वस्तुएँ भी प्राप्त होती हैं – हमारी निन्दा भी होती है – कठोर शब्दों को सुनने का अवसर आता है; सबकुछ समभावपूर्वक हमें सहना चाहिये – ऐसा वीतरागदेवों का आदेश है| सहिष्णुता वीरता का प्रतीक है और असहिष्णुता कायरता का| Continue reading “सहिष्णुता” »

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पर्युषण महापर्व – कर्तव्य दूसरा

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य दूसरा

कर्तव्य दूसरा – साधर्मिक भक्ति

द्वितीय कर्त्तव्य… साधर्मिक भक्ति ‘‘मेरा सो मेरा ही’’ ऐसी स्वार्थ वृत्ति को दूर करता है| बुद्धिनिधान अभयकुमार नामक साधर्मिक ने कालसौरिक कसाइर्२ के पुत्र सुलस को जैनधर्म-अहिंसा की प्रेरणा देकर हिंसक धंधे से दूर होने के लिए जोर-बल दिया था| मृत्यु के समय भाई के प्रति द्वेष रखने के कारण नरकमें जाकर संसार वनमें भटकने के लिए तैयार युगबाहु को पत्नी मदनरेखाने कल्याणमित्र की भूमिका बजा कर-सच्चा रिश्ता साधर्मिक का इस बात को सिद्ध करके… भाई के प्रति वैरभाव से जो असमाधि उत्पन्न हुई थी, उसको दूर करके सद्गति दिलाई और संसारमें भटकने से बचा लिया था| Continue reading “पर्युषण महापर्व – कर्तव्य दूसरा” »

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आत्मविजय

आत्मविजय

सव्वं अप्पे जिए जियं

अपने को जीतने पर सबको जीत लिया जाता है

अपने को जीतने का अर्थ है – मन को जीतना – मनोवृत्तियों को अपने वश में रखना| Continue reading “आत्मविजय” »

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Motivational Wallpaper #32

मुस्कुराने से आधे दुःख दूर हो जाते हैं

Standard Screen Widescreen Mobile
800×600 1280×720 iPad
1024×768 1280×800
1400×1050 1440×900
1600×1200 1920×1080  
  1920×1200  
  2560×1440  
  2560×1600  

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