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अनेकान्तवादी बनें
स्याद्वाद से युक्त वचनों का प्रयोग करना चाहिये
‘स्याद्वाद’ एक दार्शनिक सिद्धान्त है| ‘स्यात्’ का अर्थ अपेक्षा है; इसलिए इसे सापेक्षवाद भी कह सकते हैं| वैसे किसी एक बात का आग्रह न होने से यह ‘अनेकान्तवाद’ के नाम से ही दुनिया में अधिक प्रसिद्ध है| Continue reading “अनेकान्तवादी बनें” »
शेठ मोतीषा
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ज्ञान का सार
जं न हिंसइ किंचणं
अहिंसा या दया एक धर्म है; किन्तु इसका सम्यक् परिपालन करने से पहले ज्ञान होना आवश्यक है
सम्यग्दृष्टि में स्थिरता
सम्यग्दृष्टि साधक को सत्यदृष्टि का अपलाप नहीं करना चाहिये
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सहिष्णुता
प्रिय हो या अप्रिय-सबको समभाव से सहना चाहिये
पर्युषण महापर्व – कर्तव्य दूसरा
कर्तव्य दूसरा – साधर्मिक भक्ति
द्वितीय कर्त्तव्य… साधर्मिक भक्ति ‘‘मेरा सो मेरा ही’’ ऐसी स्वार्थ वृत्ति को दूर करता है| बुद्धिनिधान अभयकुमार नामक साधर्मिक ने कालसौरिक कसाइर्२ के पुत्र सुलस को जैनधर्म-अहिंसा की प्रेरणा देकर हिंसक धंधे से दूर होने के लिए जोर-बल दिया था| मृत्यु के समय भाई के प्रति द्वेष रखने के कारण नरकमें जाकर संसार वनमें भटकने के लिए तैयार युगबाहु को पत्नी मदनरेखाने कल्याणमित्र की भूमिका बजा कर-सच्चा रिश्ता साधर्मिक का इस बात को सिद्ध करके… भाई के प्रति वैरभाव से जो असमाधि उत्पन्न हुई थी, उसको दूर करके सद्गति दिलाई और संसारमें भटकने से बचा लिया था| Continue reading “पर्युषण महापर्व – कर्तव्य दूसरा” »
आत्मविजय
अपने को जीतने पर सबको जीत लिया जाता है















