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भगवती अहिंसा

भगवती अहिंसा

भगवती अहिंसा…. भीयाणं पि व सरणं

भगवती अहिंसा भीतों (डरे हुओं) के लिए शरण के समान है

भीत अर्थात् संकटग्रस्त डरा हुआ व्यक्ति अपनी सुरक्षा के लिए किसी समर्थ व्यक्ति की शरण ढूँढता है| शरण या आश्रय मिल जाने पर शरणार्थी सन्तुष्ट हो जाता है – निर्भय हो जाता है; वैसे ही भगवती अहिंसा का आश्रय लेने पर भी व्यक्ति सन्तुष्ट एवं निर्भय हो जाता है| Continue reading “भगवती अहिंसा” »

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तीर्थप्रभावना – साल का दसवां कर्तव्य

तीर्थप्रभावना   साल का दसवां कर्तव्य
श्रावक की क्रिया, श्रावक के प्रत्येक अनुष्ठान, श्रावक का वेश, श्रावक की भाषा, श्रावक के आचार, दुनिया के साथ श्रावक का व्यवहार इत्यादि ऐसे होने चाहिए कि जिसे देखकर दूसरों को उस श्रावक पर और उसके द्वारा जैन धर्म प्रति अहोभाव हो जाए| नौकर को भी कौटुंबिक पुरुष समझना चाहिए और उसे भी सभी आराधना में जोडना चाहिए और धर्म करने के लिए अनुकूलता कर देनी चाहिए| इसतरह अजैन को जैन बनाएँ और जैनको यथार्थ जैन बनाएँ| Continue reading “तीर्थप्रभावना – साल का दसवां कर्तव्य” »

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तारा मुखडा उपर जाउं वारी

Listen to तारा मुखडा उपर जाउं वारी

(राग : ओली चंदनबाळाने बारणे)
भाव : चंदनबाळा नी प्रभुवीर प्रत्येनी शुभ भावना

बतारा मुखडा उपर जाउं वारी रे,
वीर मारां मन मान्या, तारा दर्शननी बलिहारी रे वीर,
मुठी बाकुळा माटे आव्या रे; मने हेत धरी बोलाव्या रे.

…वीर.१

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Stuti

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जीवन की क्षणभुंगरता

जीवन की क्षणभुंगरता

वओ अच्चेति जोव्वणं च

आयु बीत रही है और युवावस्था भी

ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है, त्यों-त्यों हमारी आयु भी क्रमशः व्यतीत होती जाती है| जब से हमने जन्म लिया है – आँखें खोली हैं, दुनिया देखी है; तभी से हमारी अवस्था एक – एक क्षण घटती जा रही है| लोग समझते हैं कि हम बड़े हो रहे हैं; परन्तु वास्तविकता यह है कि वे छोटे हो रहे हैं| जितने दिन-रात बीतते जाते हैं; उतने निर्धारित आयु में से घटते जाते हैं| इस प्रकार आयुष्य प्रतिक्षण क्षीण से क्षीणतर होता जाता है| Continue reading “जीवन की क्षणभुंगरता” »

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पर्युषण महापर्व – कर्तव्य पहला

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य पहला

“कर्तव्य पहला – अमारि प्रवर्तन”

धर्मका मूल दया है -

दया धर्मका मूल है, पापमूल अभिमान,
तुलसी दया न छोड़ीये, जब लग घटमें प्राण||

जब दया जीवनकर्तव्य है, तब पर्युषण का तो महाकर्तव्य बनता ही है| इसे प्रथम नंबर का कर्तव्य समझना, क्योंकि दयासे अपना हृदय मृदु-कोमल बनता है और कोमल हृदयमें दूसरे सभी धर्म अच्छी तरह से बास कर सकते हैं| भूमि को जोतकर मुलायम बनायी हो, तो ही उसमें बीज को बोया जा सकता है| इसलिए यहॉं पर्युषणमें दया-अमारि प्रवर्तन का पहला कर्तव्य पालन करके हृदयको कोमल-मुलायम सा बनाना है, जिससे उसमें साधर्मिक भक्ति, क्षमापना, त्याग, तपश्चर्यादि धर्मो को बोया जा सके| Continue reading “पर्युषण महापर्व – कर्तव्य पहला” »

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जीने की विधि

जीने की विधि

पक्षं कञ्चन नाश्रयेत्
या तो अकेले ही जीने की कला सीख लेनी चाहिए या फिर सहजीवन – समूहजीवन जीने का तरीका समझ लेना चाहिए| Continue reading “जीने की विधि” »

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पृथ्वीकाय की जयणा

पृथ्वीकाय की जयणा
मिट्टी, पत्थर, खनिज, धातुयें, रत्न इ. पृथ्वीकाय के शरीर हैं| गम- नागमन से, वाहन-व्यवहार से, अन्य शस्त्र संस्कार इत्यादि से पृथ्वीकाय अचित्त बनते हैं| जीवन व्यवहार में निरर्थक सचित्त पृथ्वीकाय की विराधना (हिंसा) न हो जाये उसकी सावधानी रखनी चाहिए| Continue reading “पृथ्वीकाय की जयणा” »

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मन के जीते जीत

मन के जीते जीत

इमेण चेव जुज्झाहि,
किं ते जुज्झेण बज्झओ ?

आन्तरिक विकारों से ही युद्ध कर, बाह्य युद्ध से तुझे क्या लाभ?

कहावत है :- ‘‘लड़ाई में लड्डू नहीं बँटते !’’ इसका आशय यह है कि युद्ध में लाभ कुछ नहीं होता| दोनों पक्षों को हानि ही उठानी पड़ती है – एक को कुछ अधिक तो एक को कुछ कम| Continue reading “मन के जीते जीत” »

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