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जीव विचार – गाथा 7

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न तृप्ति, न तृष्टि

न तृप्ति, न तृष्टि

देवावि सइंदगा न तित्तिं न तुट्ठिं उवलभन्ति

इन्द्रों सहित देव भी (विषयों से) न कभी तृप्त होते हैं, न सन्तुष्ट

पॉंच इन्द्रियॉं हैं और उनके अलग-अलग विषय हैं| जीवनभर जीव विषय-सामग्री को जुटाने के लिए दौड़-धूप करता रहता है| एक इन्द्रिय के विषय जुटाने पर दूसरी इन्द्रिय के और दूसरी के बाद तीसरी, चौथी और पॉंचवी इन्द्रिय के विषय क्रमशः जुटाने पड़ते हैं| Continue reading “न तृप्ति, न तृष्टि” »

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सब कुछ तुम्हारी पात्रता पर निर्भर है

सब कुछ तुम्हारी पात्रता पर निर्भर है
अगर तुम्हारा पात्र भीतर से बिलकुल शुद्ध है, निर्मल है, निर्दोष है, तो जहर भी तुम्हारे पात्र में जाकर निर्मल और निर्दोष हो जाएगा| Continue reading “सब कुछ तुम्हारी पात्रता पर निर्भर है” »

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अइमुत्ता मुनि

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कर्म का मूल हिंसा

कर्म का मूल हिंसा

कम्ममूलं च जं छणं

जो क्षण है, वह कर्म का मूल है

‘क्षण’ शब्द ‘क्षणवधे’ इस तनादि गण की उभयपदी सकर्मक धातु से बना है, जिसका अर्थ है – हिंसा| वैसे इस शब्द के और भी अनेक अर्थ हैं – निमेषक्रिया का चतुर्थ भाग, उत्सव, अवसर आदि; परन्तु इस सूक्ति में उस का मूल अर्थ ‘वध’ या ‘हिंसा’ ही ठीक लगता है| Continue reading “कर्म का मूल हिंसा” »

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चहक एक चिड़िया की

चहक एक चिड़िया की
एक पेड़ पर चिड़िया अपनी मस्ती में चहक रही थी| उस पेड़ के नीचे एक भक्त विश्राम कर रहा था| चिड़िया की चहक सुनकर भक्त बोला, ‘‘अहा ! चिड़िया भी भगवान को याद कर रही है|’’ Continue reading “चहक एक चिड़िया की” »

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नाम कर्म

नाम कर्म
किसी को रुपवान शरीर होता है,
किसी को कुरुप शरीर होता हैं, Continue reading “नाम कर्म” »

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अज्ञ कौन है ?

अज्ञ कौन है ?

बालो पापेहिं मिज्जति

अज्ञ पापों पर घमण्ड करता है

कार्य दो तरह के होते हैं – भले और बुरे| भले कार्य पुण्य और बुरे कार्य पाप कहलाते हैं| Continue reading “अज्ञ कौन है ?” »

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पावापुरी जल मंदिर

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आलोचना शुद्धि – साल का ग्यारहवां कर्तव्य

आलोचना शुद्धि   साल का ग्यारहवां कर्तव्य
यह कर्तव्य अत्यंत महत्वपूर्ण है| अहंकार के कारण जीवको कभी भी अपनी गलती नहीं दिखाई देती|

धमाका हुआ| तब भतीजेने पूछा, ‘‘चाचा ! क्या हुआ ?’’ चाचाने कहा, ‘‘कुछ नहीं बेटा… वह तो मेरी धोती, कफनी और टोपी गिर गई|’’ भतीजेने पुनः प्रश्न किया, ‘‘किन्तु इसमें इतनी आवाज़ ?’’ चाचाने कहा, ‘‘तू समझता नहीं है, उसमें मैं भी था !’’ बात यह है कि चाचा कहने के लिए तैयार नही है कि, ‘‘मैं गिर गया’’| Continue reading “आलोचना शुद्धि – साल का ग्यारहवां कर्तव्य” »

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