श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिन स्तवन
मुनिसुव्रत जिनराय,
एक मुज विनती निसुणोज़
आतमतत्त्व क्युं जाणुं जगद्गुरु,
एह विचार मुज कहीयो;
आतमतत्त्व जाण्या विण निरमल,
चित्तसमाधि नवि लहियो
श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिन स्तवन
मुनिसुव्रत जिनराय,
एक मुज विनती निसुणोज़
आतमतत्त्व क्युं जाणुं जगद्गुरु,
एह विचार मुज कहीयो;
आतमतत्त्व जाण्या विण निरमल,
चित्तसमाधि नवि लहियो
हँसते हुए नहीं बोलना चाहिये
श्री धर्मनाथ जिन स्तवन
धर्म जिनेसर गाउं रंगशुं,
भंग न पडशो हो प्रीत जिनेश्वर;
दुजो मन मंदिर आणुं नहीं,
ए अम कुळवट रीत.
कुशल पुरुष न बद्ध होता है, न मुक्त
मोहग्रस्त व्यक्ति न इस पार रहते हैं, न उस पार
खाने-पीने की मात्रा के ज्ञाता बनो
यह जीव अनेक बार उच्च गोत्रमें और अनेक बार नीच गोत्र में जन्म ले चुका है; परन्तु इससे न कोई हीन होता है, न महान|
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