भवतण्हा लया वुत्ता, भीमा भीमफलोदया
संसार की तृष्णा भयंकर फल देनेवाली एक भयंकर लता है
संसार की तृष्णा भयंकर फल देनेवाली एक भयंकर लता है
किये हुए को कृत और न किये हुए को अकृत कहना चाहिये
अहिंसा त्रस एवं स्थावर समस्त भूतों (प्राणियों) का कल्याण करनेवाली है
सत्य, हित, मित और ग्राह्य वचन बोलें
दुःख पाप से मिलता है| Continue reading “मेरा सिद्धान्त” »
अवधू! क्या मागुं गुनहीना?
वे गुनगनन प्रवीना,
अवधू! क्या मागुं गुनहीना?
गाय न जानुं बजाय न जानुं न जानुं सुरभेवा,
रीझ न जानुं रीझाय न जानुं न जानुं पदसेवा.
यथावसर संचित धन को तो अन्य व्यक्ति उड़ा लेते हैं और परिग्रही को अपने पापकर्मों का दुष्फल स्वयं भोगना पड़ता है
भगवान ने सर्वत्र अनिदानता (निष्कामता) की प्रशंसा की है
जो जन (कामनाओं को) पार कर गये हैं, वे सचमुच ही मुक्त हैं