निग्धिणो, निसंसो, महब्भभओ
प्राणवध चण्ड है, रौद्र है, क्षुद्र है, अनार्य है, करुणारहित है, क्रूर है, भयंकर है
प्राणवध चण्ड है, रौद्र है, क्षुद्र है, अनार्य है, करुणारहित है, क्रूर है, भयंकर है
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मूर्च्छा को ही परिग्रह कहा गया है
जो दूसरे मनुष्य का परिभव (तिरस्कार) करता है, वह संसार में भटकता रहता है
1. ध्यान, प्राणायाम, आसन आदि की विधि
2. हाथी, घोड़ा, रथ आदि चलाना
3. मिट्टी और कांच के बर्तनों को साफ रखना
4. लकड़ी के सामान पर रंग-रोगन सफाई करना
5. धातु के बर्तनों को साफ करना और उन पर पालिश करना
6. चित्र बनाना
7. तालाब, बावड़ी, कमान आदि बनाना Continue reading “64 कला” »
अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम
त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम् |
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति
तच्चारु – चूत – कलिका – निकरैकहेतुः ||5||
श्री ऋषभदेव जिन स्तवन
राग : परदीप
Continue reading “तुम दरिशन भले पायो” »
हमे इस जीव हिंसा के पाप से बचना होगा| Continue reading “जियो और जीने दो” »
भाव : मन… चंचलता मननी निर्मलता मननी निश्चलता
प्रसन्नचंद्रनी ७मी नरक अनुत्तर विमान.. ने केवलज्ञाननी साधना
प्रणमुं तुमारा पाय,
प्रसन्नचंद्र प्रणमुं तुमारा पाय;
तुमे छो मोटा ऋषिराय…
राज छोडी रळीयामणुं रे, जाणी अथीर संसार,
vवैरागे मन वाळीयुं रे, लीधो संयम भार