श्री सुपार्श्वनाथ जिन स्तवन
राग : दिलरंजन जीनराजजी…(ये जींदगी उसीकी है)
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सप्तम जिनवर सेवीए
साधुओं की प्रसन्नता
महप्पसाया इसिणो हवंति
ऋषि सदा प्रसन्न रहते हैं
सम्राट प्रजापल के प्रश्न

प्रश्न – बिना आग के कौन जलाती है ?
उत्तर – ईर्ष्या, तृष्णा, चिन्ता, कर्जदारी, नव-जवान कुंआरी लड़की, विधवा बहु-बेटी| Continue reading “सम्राट प्रजापल के प्रश्न” »
अपराजेय शत्रु
एगप्पा अजिए सत्तू
एक असंयत आत्मा ही अजित शत्रु है
जिसे हम अपना शत्रु समझते हैं| Continue reading “अपराजेय शत्रु” »
तप से पूजा की कामना न करें
नो पूयणं तवसा आवहेज्जा
तप के द्वारा पूजा (प्रतिष्ठा) की अभिलाषा नहीं करनी चाहिये
जीव और शरीर
ओ जीवो अं सरीरं
जीव अन्य है, शरीर अन्य
पाप न करें, न करायें
पावकम्मं नेव कुज्जा न कारवेज्जा
पापकर्म न स्वयं करना चाहिये और न दूसरों से कराना चाहिये
मूर्ख की संगति न करें
अलं बालस्स संगेणं
बाल (अज्ञानी या मूर्ख) की संगति नहीं करनी चाहिये


















