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अपना दुःख

अपना दुःख

एगो सयं पच्चणुहोइ दुक्खं

आत्मा अकेला ही अपना दुःख भोगता है

दुःख अपनी भूल का एक अनिवार्य परिणाम है, जिसे प्रत्येक प्राणी भोगता है| अपना दुःख दूसरा कोई बँटा नहीं सकता| चाहे कोई कितना भी घनिष्ट मित्र हो, रिश्तेदार हो, कुटुम्बी हो- अपने दुःख में वे लोग सहानुभूति प्रकट कर सकते हैं – सेवा कर सकते हैं – सहायता कर सकते हैं, परन्तु हमारा दुःख वे छीन नहीं सकते – भोग नहीं सकते | Continue reading “अपना दुःख” »

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मैं अन्य हूँ

मैं अन्य हूँ

ए खलु कामभोगा, ओ अहमसि

कामभोग अन्य हैं, मैं अन्य हूँ

मधुर संगीत, सुन्दर दृश्य, इत्र, पुष्प हार, मिठाई, नमकीन, कोमल एवं शीतल वस्तु का स्पर्श आदि अनेक कामभागों की विविध आकर्षक सामग्री इस जगत में सर्वत्र बिखरी पड़ी है| Continue reading “मैं अन्य हूँ” »

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निन्दक भटकता है

निन्दक भटकता है

जो परिभवइ परं जणं,
संसारे परिवत्तई महं

जो दूसरे मनुष्य का परिभव (तिरस्कार) करता है, वह संसार में भटकता रहता है

सब मनुष्य एक से एक बढ़कर हैं| कोई इससे बड़ा है तो कोई उससे-कोई अमुक गुण में महान है तो कोई अमुक गुण में; इसलिए कभी किसी को अपने से तुच्छ मानने की भूल नहीं करनी चाहिये| Continue reading “निन्दक भटकता है” »

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सन्तोषी पाप नहीं करते

सन्तोषी पाप नहीं करते

सन्तोसिणो नो पकरेंति पावं

सन्तोषी पाप नहीं करते

लोभ पाप का मूल कारण है| ज्यों-ज्यों व्यक्ति लाभान्वित होता जाता है, त्यों-त्यों वह अधिक से अधिक पापमार्ग में प्रवृत होता जाता है; क्यों कि लाभ के अनुपात में उसका लोभ बढ़ता रहता है, जो अनुचित एवं अन्यायपूर्ण कार्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करता रहता है| Continue reading “सन्तोषी पाप नहीं करते” »

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धर्मानुकूल आजीविका

धर्मानुकूल आजीविका

धम्मेणं चेव वित्तिं कप्पेमाणा विहरंति

सद्गृहस्थ धर्मानुकूल ही आजीविका करते हैं

जीवित रहने के लिए अन्न और जल चाहिये – कुटुम्ब का पोषण करने के लिए धन चाहिये| मुनियों की बात दूसरी है; परन्तु जो गृहस्थ है, उन्हें तो इस संसार में पद पद पर सम्पत्ति की आवश्यकता होती है| कहते हैं – जिस मुनि के पास कौड़ी (एक पैसा भी) हो, वह कौड़ी का और जिस गृहस्थ के पास कौड़ी न हो, वह भी कौड़ी का ! Continue reading “धर्मानुकूल आजीविका” »

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