दाणाण सेट्ठं अभयप्पयाणं
अभयदान श्रेष्ठ दान है
साधक को कोई यदि दुर्वचन कहे; तो भी वह उस पर क्रोध न करे
मुनियों का हृदय शरद्कालीन नदी के जल की तरह निर्मल होता है| वे पक्षी की तरह बन्धनों से विप्रमुक्त और पृथ्वी की तरह समस्त सुख-दुःखों को समभाव से सहन करने वाले होते हैं
तू, तुम जैसे अमनोहर शब्द कभी नहीं बोलें
संसार में जो वन्दन पूजन (सन्मान) है, साधक उसे महान दलदल समझे