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अनाथ नाथ नहीं हो सकता

अनाथ नाथ नहीं हो सकता

अप्पणा अनाहो सन्तो,
कहं नाहो भविस्ससि?

तू स्वयं अनाथ है, तो फिर तू दूसरे का नाथ कैसे हो सकता है ?

यदि कोई यह समझता है कि मैं किसीका रक्षक हूँ – पालक हूँ – नाथ हूँ, तो यह उसका भ्रम है, क्योंकि इस दुनिया में कोई व्यक्ति किसीकी रक्षा या नाश नहीं कर सकता| व्यक्ति के अपने पूर्वार्जित शुभाशुभ कर्म ही उसका रक्षण और विनाश करते हैं|

फिर जो व्यक्ति जेल की कोठरी में स्वयं बन्द है, वह दूसरे बन्दियों को नहीं छुड़ा सकता| जो स्वयं भूखा है, वह दूसरों की भूख कैसे मिटा सकता है ? जो स्वयं कर्मों के बन्धन में जकड़ा हुआ संसार में भटक रहा है, वह दूसरों को बन्धन-मुक्त कैसे कर सकता है ? जो स्वयं असुरक्षित है, वह दूसरों का रक्षक कैसे हो सकता है?

प्रत्येक सांसारिक प्राणी के पीछे जन्म-जरा-मृत्यु का चक्कर लगा हुआ है, इसलिए दूसरों को वह इस चक्कर से कैसे बचा सकता है ?

शुभाशुभ कर्मों से लिपटी हुई प्रत्येक आत्मा अपनी अपनी आधि-व्याधि-उपाधियों से बँधी हुई है| ऐसी अवस्था में दूसरों को वह मुक्त कैसे कर सकती है ?

ठीक ही कहा गया है कि जब कोई स्वयं अनाथ हो, तब वह दूसरों का नाथ नहीं हो सकता|

- उत्तराध्ययन सूत्र 20/12

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