post icon

दुर्गति की दिशा में

दुर्गति की दिशा में

आसुरीयं दिसं बाला, गच्छंति अवसा तमं

अज्ञ जीव विवश होकर अन्धकाराच्छदन
आसुरी गति को प्राप्त होते हैं

जिनमें सम्यग्बोध नहीं है, वे गुलाम बन जाते हैं और फलस्वरूप दुर्गति को प्राप्त होते हैं|

कर्म व्यक्ति के हाथ में है अर्थात् वह कर्म करने में स्वतन्त्र है; परन्तु कर्मों का फल भोगने में वह परतन्त्र है| जब तक जीव अपने शुभाशुभ कर्मों का शुभाशुभ फल भोग नहीं लेता; तब तक उसकी मुक्ति नहीं हो सकती|

मुक्ति के लिए जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, बन्ध, निर्जरा और मोक्ष-इन सभी नव तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान आवश्यक है| जिसे यह ज्ञान हो जाता है, वही यह समझ सकता है कि आत्मा ही सर्व श्रेष्ठ तत्त्व है| वही चेतनामय है – ज्ञानमय है – भावनामय है – चारित्रमय है – स्वतंत्र है| वह यह भी जान लेता है कि कर्म जड़ हैं – ज्ञानहीन हैं – भावनाहीन हैं – चारित्रहीन हैं और वे आत्मा के ज्ञान दर्शन चरित्र में बाधक हैं| इस प्रकार आत्मा के चैतन्य और कर्मों के जड़त्व का ज्ञान उसे सद्गति (मोक्ष) की ओर प्रेरित करता है| इसके विपरीत अज्ञ जीव विवशतापूर्वक दुर्गति की दिशा में बढ़ते रहते हैं|

- उत्तराध्ययन सूत्र 7/10

Did you like it? Share the knowledge:


Advertisement

No comments yet.

Leave a comment

Leave a Reply

Connect with Facebook

OR