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दूर से ही त्याग

दूर से ही त्याग

कुसीलवड्ढणं ठाणं, दूरओ परिवज्जए

कुशील (दुराचार) बढ़ानेवाले कारणों का दूर से ही त्याग करना चाहिये

शील का अर्थ है – स्वभाव| जिसका स्वभाव अच्छा होता है – प्रशंसनीय होता है, वह सुशील कहलाता है| जो व्यक्ति चाहता है कि सब लोग उससे प्यार करें – उसकी प्रशंसा करें, वह सदा सुशील बनने का और बने रहने का प्रयास करेगा|

शील का एक अर्थ आचरण भी है| इस दृष्टि से सदाचारी सुशील है, जो कुशील (दुराचार) से बचने और बचे रहने का प्रयास करता है|

कुशील से बचने के लिए ऐसे कारणों का त्याग करना पड़ता है, जिनसे कुशील में वृद्धि हो सकती है| बुरे व्यक्तियों अथवा दुराचारियों की संगति में रहने से व्यक्ति दुराचारी बन जाता है और लगातार ऐसी कुसंगति के अवसर आते रहें; तो उसके दुराचरण में क्रमशः वृद्धि होती रहती है|

दूसरा कारण है – दुष्टों एवं अत्याचारियों की ऐसी कहानियॉं सुनना, जिनमें उनकी सुख-समृद्धि का वर्णन किया गया हो| इससे दुराचारी बनने की प्रेरणा मिलती है|

ज्ञानी कहते हैं कि कुशील बनाने वाले या कुशीलता बढ़ाने वाले ऐसे कारणों को दूर से ही त्याग देना चाहिये|

- दशवैकालिक सूत्र 6/56

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