वितिगिच्छासमावेणं अप्पाणेणं
नो लहइ समाहिं
नो लहइ समाहिं
शंकाशील व्यक्ति को कभी समाधि नहीं मिलती
शंकाशील व्यक्ति को कभी समाधि नहीं मिलती
पीठ का मांस नहीं खाना चाहिये अर्थात् किसी की निन्दा उसकी अनुपस्थिति में नहीं करनी चाहिये
क्रुद्धा लुब्ध और मुग्ध हिंसा करते हैं
साधुओं से सम्पर्क रखना चाहिये
संगति पूरे जीवन को प्रभावित करती है| वह उन्नति के द्वार खोल देती है| एक कीट – कितना साधारण जीवन होता है उसका? परन्तु फूलों के साथ रहकर भगवान की मूर्ति के सिरपर जा पहुँचता है वह| एक छोटी नदी या नाला गंगा के साथ मिलकर कहॉं जा पहुँचता है? रत्नाकर समुद्र में| Continue reading “साधु-सम्पर्क” »
आतुर परिताप देते हैं
ज्ञानी स्व-परकल्याण करने में समर्थ होते हैं
जो नये कर्मों का बन्धन नहीं करता, उसके पूर्वसञ्चित पापकर्म भी नष्ट हो जाते हैं
असंयम से निवृत्ति और संयम में प्रवृत्ति होनी चाहिये