ममत्तं छिंदए ताए, महानागोव्व कंचुयं
आत्मसाधक ममत्व के बन्धन को तोड़ फेंके; जैसे महानाग कञ्चुक को उतार देता है
आत्मसाधक ममत्व के बन्धन को तोड़ फेंके; जैसे महानाग कञ्चुक को उतार देता है
सूर्य के उदय होने पर भी आँख से ही देखा जा सकता है
निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि दुःख कामासक्ति से उत्प होता है
संसार की तृष्णा भयंकर फल देनेवाली एक भयंकर लता है
किये हुए को कृत और न किये हुए को अकृत कहना चाहिये
अहिंसा त्रस एवं स्थावर समस्त भूतों (प्राणियों) का कल्याण करनेवाली है
सत्य, हित, मित और ग्राह्य वचन बोलें
यथावसर संचित धन को तो अन्य व्यक्ति उड़ा लेते हैं और परिग्रही को अपने पापकर्मों का दुष्फल स्वयं भोगना पड़ता है
भगवान ने सर्वत्र अनिदानता (निष्कामता) की प्रशंसा की है
जो जन (कामनाओं को) पार कर गये हैं, वे सचमुच ही मुक्त हैं