बुद्धिमान साधक लार चाटने वाला न बने अर्थात् परित्यक्त भोगों की पुनः कामना न करे
थूक न चाटें
से मइमं परिय मा य हु लालं पच्चासी
जब आँखें खोलकर साधक दुनिया में यह देखता है कि लोग भोग से रोग के शिकार बनते हैं – वैद्यों और डाक्टरों के द्वार खटखटाते हैं – उनके लम्बे-लम्बे बिल चुकाते हैं; फिर भी रोगों के चंगुल से वे अपनी पूरी तरह पिण्ड नहीं छुड़ा पाते, एक के बादे एक कोई-न-कोई रोग शरीर में उत्पन्न होता ही रहता है; Continue reading “थूक न चाटें” »
असंविभागी
असंविभागी न हु तस्स मोक्खो
जो संविभागी नहीं है अर्थात् प्राप्त सामग्री को साथियों में बॉंटता नहीं है, उसकी मुक्ति नहीं होती
समय को पहचानिये
अणभिक्कंतं च वयं संपेहाए,
खणं जाणाहि पंडिए
खणं जाणाहि पंडिए
हे बुद्धिमान साधक! अवशिष्ट आयु को देखते हुए समय को पहचान-अवसर का मूल्य समझ
सच्ची शिक्षा
अट्ठजुत्ताणि सिक्खिज्जा,
निरट्ठाणि उवज्जए
निरट्ठाणि उवज्जए
निरर्थक शिक्षा छोड़कर सार्थक शिक्षा ही ग्रहण करें
राग द्वेष के कारण
रागस्स हेउं समणुमाहु,
दोसस्स हेउं अमणुमाहु
दोसस्स हेउं अमणुमाहु
मनोज्ञ शब्दादि राग के और अमनोज्ञ द्वेष के कारण कहे गये हैं
कोमल प्रशंसात्मक शब्द हमें अच्छे लगते हैं और कठोर निन्दात्मक शब्द बुरे| Continue reading “राग द्वेष के कारण” »
राग द्वेष का क्षय
रागस्स दोसस्स य संखएणं
एगंतसोक्खं समुवेइ मोक्खं
एगंतसोक्खं समुवेइ मोक्खं
राग-द्वेष के क्षय से जीव एकान्तसुखस्वरूप मोक्ष को प्राप्त करता है
सद्गुण साधना
बाहाहिं सागरो चेव,
तरियव्वो गुणोदहिं
तरियव्वो गुणोदहिं
सद्गुण-साधना का कार्य भुजाओं से समुद्र तैरने के समान है
विज्ञान और धर्म
विण्णए समागम्म धम्मसाहणमिच्छिउं
धर्म के साधनों का विज्ञान से समन्वय करना चाहिये
श्रद्धा से टिके रहें
जाए सद्धाए निक्खंते,
तमेव अणुपालेज्जा विजहित्ता विसोत्तियं
तमेव अणुपालेज्जा विजहित्ता विसोत्तियं
जिस श्रद्धा के साथ निष्क्रमण किया है, उसी श्रद्धा के साथ विस्त्रोतसिका (शंका) छोड़कर उसका अनुपालन करना चाहिये
उत्तम तप
तवेसु वा उत्तमं बंभचेरं
ब्रह्मचर्य तपों में उत्तम है


















