सन्तोसिणो नो पकरेंति पावं
सन्तोषी पाप नहीं करते
सन्तोषी पाप नहीं करते
सिंह के समान निर्भीक; केवल शब्दों से न डरिये
सबको जीवन प्रिय है, किसीके प्राणों का अतिपात नहीं चाहिये
करणसत्य में रहनेवाला जीव जैसा बोलता है, वैसा ही करता है
वीतरागता से स्नेह औ तृष्णा के बन्धन कट जाते हैं
हे पुरुष! तू सत्य को ही अच्छी तरह जान ले
जो विचारपूर्वक परिमित और निर्दोष वचन बोलता है, वह सज्जनों के बीच प्रशंसा पाता है
सद्गृहस्थ धर्मानुकूल ही आजीविका करते हैं
मायावी और प्रमादी फिर से गर्भ में आते हैं
ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों त्यों लोभ होता है और लाभ से लोभ बढ़ता रहता है
सफलता से उत्साह बढ़ता है और विफलता से वह नष्ट हो जाता है| Continue reading “लाभ और लोभ” »