लाभुत्ति न मज्जिज्जा, अलाभुत्ति न सोइज्जा
लाभ होने पर घमण्ड में फूलना नहीं चाहिये और लाभ न होने पर शोक नहीं करना चाहिये
लाभ होने पर घमण्ड में फूलना नहीं चाहिये और लाभ न होने पर शोक नहीं करना चाहिये
अपने पर नियन्त्रण रखनेवाला ही इस लोक तथा परलोक में सुखी होता है
सर्वथा काया को मोह छोड़ता हूँ – मेरी देह पर कोई परीषह जैसे है ही नहीं
विचित्र (लच्छेदार) भाषाएँ भी (दुराचारी की दुर्गति से) रक्षा नहीं कर सकतीं, फिर विद्यानुशासन (पाण्डित्य) की तो बात ही क्या?
हे राजन्! बुढ़ापा मनुष्य के सौन्दर्य को नष्ट कर देता है
मुनियों का हृदय शरद्कालीन नदी के जल की तरह निर्मल होता है| वे पक्षी की तरह बन्धनों से विप्रमुक्त और पृथ्वी की तरह समस्त सुख-दुःखों को समभाव से सहन करने वाले होते हैं
थोड़ा मिलने पर झुँझलाएँ नहीं
सम्यग्दर्शी पाप नहीं करता
साधक को कोई यदि दुर्वचन कहे; तो भी वह उस पर क्रोध न करे