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साधो भाई ! समता रंग रमीजे

Listen to साधो भाई ! समता रंग रमीजे

साधो भाई ! समता रंग रमीजे,
अवधू ! ममता संग न कीजे,
साधो भाई ! समता रंग रमीजे.
संपत्ति नाहि नाहि ममता में रमता राम समेटे,
खाट पाट तजी लाख खटाउ अंत खाख में लेटे.

…साधो.1

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जयणा की जडीबूटियॉं

जयणा की जडीबूटियॉं
1) मोर के पंख :- मोर के पंख को रखने से या हिलाने से सॉंप तथा छिपकली भाग जाती है|

2) काली मिर्च :- केसर की डब्बी में काली मिर्च के दाने डालने से नमी के कारण उसमें होनेवाली जीवोत्पत्ति रुक जाती हैं|

3) डामर की गोली :- कपडें, पुस्तकों की बैग, अलमारी वगैरह में डामर की गोली रखने से जीवों की उत्पत्ति नहीं होती|

4) पारा :- अनाज में पारे की गोली डालने से अनाज सड़ता नहीं तथा जीवोत्पत्ति होती नहीं| Continue reading “जयणा की जडीबूटियॉं” »

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तुम वही पाओगे…जो तुम बोओगे

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दूर से ही त्याग

दूर से ही त्याग

कुसीलवड्ढणं ठाणं, दूरओ परिवज्जए

कुशील (दुराचार) बढ़ानेवाले कारणों का दूर से ही त्याग करना चाहिये

शील का अर्थ है – स्वभाव| जिसका स्वभाव अच्छा होता है – प्रशंसनीय होता है, वह सुशील कहलाता है| जो व्यक्ति चाहता है कि सब लोग उससे प्यार करें – उसकी प्रशंसा करें, वह सदा सुशील बनने का और बने रहने का प्रयास करेगा| Continue reading “दूर से ही त्याग” »

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जीव विचार – गाथा 3-4

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अवक्तव्य

अवक्तव्य

जं छं तं न वत्तव्वं

जो गोपनीय हो उसे न कहें

जो गोपनीय बात हो, उसे गुप्त ही रखनी चाहिये| समय या योग्य अवसर आने पर ही उसका प्रकाशन उपयुक्त होता है| Continue reading “अवक्तव्य” »

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A Spring Festival

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मेरी तुं मेरी तुं कांही डरेर

Listen to मेरी तुं मेरी तुं कांही डरेर

मेरी तुं मेरी तुं कांही डरेर, मेर
कहे चेतन समता सुनि आखर, और दैढ दिन जूठ लरेरी.

…मेरी.१

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न प्रिय, न अप्रिय

न प्रिय, न अप्रिय

सव्वं जगं तु समयाणुपेही,
पियमप्पियं कस्स वि नो करेज्जा

सारे जगत को जो समभाव से देखता है उसे न किसी का प्रिय करना चाहिये, न अप्रिय

भावना हमारे समस्त कार्यकलाप की प्रेरिका है| यदि उसमें शुद्ध रहे; तो हमसे शुद्ध कार्य होंगे और यदि उसमें अशुद्धि रहे; तो अशुद्ध कार्य होंगे| Continue reading “न प्रिय, न अप्रिय” »

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शंकाशील न बनें

शंकाशील न बनें

वितिगिच्छासमावेणं अप्पाणेणं
नो लहइ समाहिं

शंकाशील व्यक्ति को कभी समाधि नहीं मिलती

साधक अपनी साधना प्रारम्भ करने से पहले सद्गुरु के प्रवचन सुनता है| उससे शास्त्रों के प्रति रुचि जागृत होती है| फिर स्वयं शास्त्रों का अध्ययन करके अपने लिए एक मार्ग चुनता है – जीवन की उत्कृष्ट पद्धति को समझता है – उस पर ऊहापोह करके, चिन्तन मनन करके अपना विश्‍वास स्थिर करता है और फिर उठकर चल पड़ता है – चलता रहता है, जब तक उसे सिद्धि प्राप्त नहीं हो जाती| Continue reading “शंकाशील न बनें” »

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