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शूरम्मन्य

शूरम्मन्य

सूरं मण्णइ अप्पाणं,
जाव जेयं न पस्सति

व्यक्ति तभी तक अपने को शूरवीर मानता है, जब तक विजेता को नहीं देख लेता

दुनिया में एक से बढ़कर एक लोग चारों ओर भरे पड़े हैं| कोई रूप में बड़ा है, कोई विद्या में – कोई धन में बड़ा है तो कोई शक्ति में|

शक्ति में भी कोई लाखों से बड़ा है; तो हजारों से छोटा भी हो सकता है; क्यों कि दुनिया बहुत बड़ी है| प्रत्येक सेर के लिए कहीं-न-कहीं सवासेर अवश्य मौजूद है| ऐसी अवस्था में आसपास के लोगों से अधिक योग्यता पा कर ही अपने को कोई यदि दुनिया में सबसे बड़ा मान बैठता है; तो यह उसकी भूल है| किसी दिन यदि उसे कोई अपने से बड़ा व्यक्ति मिल गया; तो उस दिन उसका सारा घमण्ड चूर-चूर हो जायगा| समझदार व्यक्ति इसीलिए कभी अपनी योग्यताओं का घमण्ड नहीं करते|

जो लोग ऐसा करते हैं, वे अविवेकी हैं| ऐसे लोग जब तक अपने से अधिक शक्तिशाली विजेता को नहीं देख लेते, तब तक अपने आप को शूरवीर मानते रहते हैं|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/3/1/1

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सुव्रत की सद्गति

सुव्रत की सद्गति

भिक्खाए वा गिहत्थे वा,
सुव्वह गम्मई दिवं

चाहे भिक्षुक हो, चाहे गृहस्थ; जो सुव्रत है, वह स्वर्ग पाता है

यह आवश्यक नहीं है कि जो गृहस्थ है, वह सद्गति न पाये अथवा जो गृहत्यागी है, वह सद्गति अवश्य पाये| Continue reading “सुव्रत की सद्गति” »

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श्री सिद्धगिरिराज की यात्रा में करने के पाँच चैत्यवंदन

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भारतीय शास्त्रीय संगीत और उसके वैज्ञानिक महत्व

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Wallpaper #4

Know Thyself, Recognise Thyself,
Be Immersed By Thyself & you will attain Godhood

Standard Screen Widescreen
1024×768 1440×900
1600×1200 1920×1080

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पापी की पीड़ा

पापी की पीड़ा

सकम्मुणा किच्चइ पावकारी

पाप करनेवाला अपने ही कर्मों से पीड़ित होता है

चोरी करनेवाला चारों ओर से सतर्क रहता है| वह फूँक-फूँक कर कदम रखता है| डरता रहता है कि कहीं कोई उसे देख न ले – रँगे हाथों पकड़ न ले| इस प्रकार अन्त तक वह भयकी वेदना से पीड़ित होता रहता है| चोरी पकड़ी जाने पर तो उसे जेल या शारीरिक दण्ड भी भोगने पड़ते हैं| Continue reading “पापी की पीड़ा” »

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सदाचार का मूल

सदाचार का मूल

नादंसणिस्स नाणं, नाणेण विणा न होंति चरणगुणा

सम्यग्दर्शन के अभाव में ज्ञान प्राप्त नहीं होता और ज्ञान के अभाव में चारित्र-गुण प्राप्त नहीं होते

दृष्टि यदि सम्यक् न हो तो मनुष्य सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता; क्यों कि जबतक दृष्टि सम्यक् परक नहीं होगी, सम्यक् की खोज नहीं की जा सकेगी और इसके लिए आवश्यक होगा कि दृष्टि स्वयं भी सम्यक् हो| सम्यग्ज्ञान से पहले सम्यग्दर्शन होना चाहिये| Continue reading “सदाचार का मूल” »

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जैन कहो क्युं होवे

Listen to जैन कहो क्युं होवे

भाव : जैनो नी परिभाषाने अने साचा जैनत्वने समजावतु वर्णन

जैन कहो क्युं होवे, परमगुरु!
जैन कहो क्युं होवे
गुरु उपदेश बिना जन मूढा,
दर्शन जैन विगोवे.

…परम.१

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दुःखप्रदायकता

दुःखप्रदायकता

सव्वे कामा दुहावहा

सभी काम दुःखप्रद होते हैं

यहॉं ‘काम’ शब्द का अर्थ कार्य नहीं हैं, तीसरा पुरुषार्थ है| हिन्दी में काम शब्द दोनों अर्थों में प्रचलित है| इस सूक्ति में कामनाओं के त्याग का परामर्श दिया गया है और इसका कारण बताया है – उनकी दुःखदायकता| Continue reading “दुःखप्रदायकता” »

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चमत्कारी भोजन

चमत्कारी भोजन

आरोग्यरहस्यम्
एक दिन एक राजा आँधी और तूफान में फँस गया| उसने एक झोंपड़े में शरण ली| उसने देखा, बच्चे जमीन पर बैठे हुए खाना खा रहे हैं| खाने में सिर्फ पतली खिचड़ी ही थी, पर बच्चे काफी स्वस्थ दिख रहे थे| Continue reading “चमत्कारी भोजन” »

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