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Real education is the key to success

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The Gods – Their Cars – Their Bells their Family – Part 2

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आतुरता

आतुरता

आतुरा परितावेंति

आतुर परिताप देते हैं

जो व्यक्ति आतुर होते हैं अर्थात् कामातुर या विषयातुर होते हैं, वे दूसरों को परिताप (कष्ट) देते हैं – सताते हैं स्वार्थ में अन्धे बने हुए ऐसे व्यक्तियों के विवेक – चक्षु बन्द रहते हैं| उन्हें कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का भान ही नहीं रहता| अपने कण-भर सुख के लिए वे दूसरों को मणभर दुःख पहुँचाने में भी कोई संकोच नहीं करते| अपने क्षणिक सुख के लिए दूसरों को चिरस्थायी दुःख देनेवाले इन व्यक्तियों की क्रूरता अपनी चरम सीमा पर जा पहुँचती है| Continue reading “आतुरता” »

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भरत – बाहुबली

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The Fast-breaking of the Lord

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बनी मिट्टी की सब बाजी

Listen to बनी मिट्टी की सब बाजी

राग : गझल
भाव : आत्मा एक सोनुं बाकी बधु माटी… माटे आत्मा दशानी शोधनो संदेश

बनी मिट्टीकी सब बाजी, उसीमें होत क्यों राजी
मिट्टी का है शरीर तेरा, मिट्टीका कपडा पहेरा;
मिट्टी का म्हेल रहा छाजी, उसीमें होत क्यों राजी.

…बनी. १

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स्वपर-कल्याण में समर्थ

स्वपर कल्याण में समर्थ

अलमप्पणो होंति अलं परेसिं

ज्ञानी स्व-परकल्याण करने में समर्थ होते हैं

पत्थर की नाव स्वयं भी डूबती है और बैठनेवाले यात्रियों को भी डुबो देती है; किंतु जो नाव काष्ट की बनी होती है, वह स्वयं भी तैरती है और दूसरों को भी तिराती है| ज्ञानियों और अज्ञानियों में यही अन्तर है| अज्ञानी स्वयं तो संसार में भटकते ही हैं, साथ ही अपने आश्रितों को भी कुमार्ग बता कर भटकाते रहते हैं, किन्तु ज्ञानी न स्वयं भटकते हैं और न दूसरों को ही भटकाते हैं| Continue reading “स्वपर-कल्याण में समर्थ” »

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इसी क्षण को समझें

इसी क्षण को समझें

इणमेव खणं वियाणिया

प्रतिक्षण अपनी आयु ठीक उसी प्रकार क्षीण होती जा रही है, जिस प्रकार अञ्जलि में रहा हुआ जल क्षीण होता रहता है| धीरे-धीरे एक समय ऐसा आयेगा, जब आयु सर्वथा समाप्त हो जायेगी और हम अपनी अन्तिम सॉंस छोड़ कर सदा के लिए आँखें बन्द कर लेंगे| Continue reading “इसी क्षण को समझें” »

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संचित कर्मों का क्षय

संचित कर्मों का क्षय

तुट्टन्ति पावकम्माणि
नवं कम्ममकुव्वओ

जो नये कर्मों का बन्धन नहीं करता, उसके पूर्वसञ्चित पापकर्म भी नष्ट हो जाते हैं

हम जितना कुछ खाते हैं, वह सब मलद्वारसे ज्यों का त्यों नहीं निकल जाता| कुछ विष्टा के रूप में बाहर निकलता है और कुछ आँतों मे जमा रहता है- आँतों से चिपका रहता है और पड़ा-पड़ा सड़कर अनेक रोग पैदा करता है| आरोग्य के सन्देशवाहक कहते हैं कि हमें सप्ताह में एक उपवास करके पेट को विश्राम देना चाहिये| नया भोजन पेट में न पहुँचने पर वह चिपका हुआ संचित मल भी बाहर निकल जायेगा| Continue reading “संचित कर्मों का क्षय” »

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निवृत्ति – प्रवृत्ति

निवृत्ति   प्रवृत्ति

असंजमे नियत्तिं च, संजमे य पवत्तणं

असंयम से निवृत्ति और संयम में प्रवृत्ति होनी चाहिये

प्राण धारण करनेवाला प्रत्येक जीवन सक्रिय होता है| वह अच्छी या बुरी प्रवृत्ति करता रहता है| Continue reading “निवृत्ति – प्रवृत्ति” »

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