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चक्षु चाहिये
सूर्य के उदय होने पर भी आँख से ही देखा जा सकता है
भक्तामर स्तोत्र – एक दिव्य रचना
“भक्तामर स्तोत्र” भक्ति प्रधान स्तोत्र है, जैन काव्य परंपरा में इस स्तोत्र की अपनी महती महिमा और गरिमा हैं, स्वतंत्र पहचान है|
भक्तामर स्तोत्र का महत्व
अवंति के राजा हर्ष के दरबार में, मयूर तथा बाण नाम के दो महान विद्वान पंड़ितों नें राजा को अपनी-अपनी विद्वता के अनुरूप चमत्कारों के जरिए प्रभावित किया था। मयूर पंड़ित नें अपनी लड़की के शाप से हुये कोढ़ (कुष्ट) रोग के निवारण के लिए सूर्य-देवता की स्तुति की और छठ्ठे श्लोक की रचना करते वक्त सूर्य-देव ने प्रकट होकर वरदान दिया जिससे कुष्ट-रोग दूर हो गया। अपने ही ससुर मयूर पंड़ित का चमत्कार, पंड़ित बाण के लिए स्पर्धा का विषय बना। राजा के पास बाण पंड़ित नें प्रतिज्ञा की कि मैं चंड़िका-देवी की उपासना कर चमत्कार करूंगा। Continue reading “भक्तामर स्तोत्र – एक दिव्य रचना” »
तारो मोहे स्वामी
श्री अभिनंदन जिन स्तवन
राग : बागेश्चरी
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साध्वी चंदनबाला
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जाग तुं जाग तुं आतमा माहरा
श्री ऋषभदेव (आदिनाथ) जिन स्तवन
राग : प्रभातीयु
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अनुपमादेवी
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