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Continuation of Lord Rishabhdev’s life as a Sadhu

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श्रावक के दैनिक 6 कर्तव्य

श्रावक के दैनिक 6 कर्तव्य

जिनेन्द्रपूजा गुरुपर्युपास्तिः
सत्वानुकम्पा शुभपात्रदानम्|
गुणानुरागः श्रुतिरागमस्य
नृजन्मवृक्षस्य फलान्यमूनि॥
पर्युषण के दिन यानी कि आत्माके लिए महोत्सव के दिन| इन दिनोमें विशिष्ट आराधना यानी कि आत्मा के लिए मिष्टान्न भोजन| लेकिन प्रसंग पर मिष्टान्न भोजन करनेवाला सामान्य से हररोज मिष्टान्न नहीं खाता, उसका मतलब उपवास नहीं करता… दाल, चावल, रोटी और सब्जी तो जीमता ही है| Continue reading “श्रावक के दैनिक 6 कर्तव्य” »

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Quote #4

It's impossible to be massively creative if you can't stand being alone with yourself. Solitude introduces you to your genius.
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अमनोज्ञ शब्द न बोलें

अमनोज्ञ शब्द न बोलें

तुमं तुमं ति अमणुं, सव्वसो तं न वत्तए

तू, तुम जैसे अमनोहर शब्द कभी नहीं बोलें

मॉं को और ईश्‍वर को ‘तू’ कहा जाता है, शेष सबको ‘आप’ कहना चाहिये| ‘आप’ शब्द सन्मान दर्शक है| दूसरों से बातचीत करते समय अथवा पत्र व्यवहार में इसी शब्द का प्रयोग करना चाहिये| यदि हम दूसरों के लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करेंगे; तो दूसरे भी हमारे लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करके हमें सन्मान देंगे| Continue reading “अमनोज्ञ शब्द न बोलें” »

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कामासक्ति

कामासक्ति

कामेसु गिद्धा निचयं करेन्ति

कामभोगों में आसक्त रहनेवाले व्यक्ति कर्मों का बन्धन करते हैं

पॉंच इन्द्रियों में से चक्षुइन्द्रिय और श्रोत्रेन्द्रिय अर्थात् आँख और कान के विषय ‘काम’ कहलाते हैं – जैसे सुन्दर चित्र, नाटक, सिनेमा, मनोहर दृश्य, नृत्य आदि आँख के विषय हैं और श्रृङ्गाररस की कथाएँ या कविताएँ, फिल्मी गाने, विविध वाद्य, अपनी प्रशंसा, स्त्रियों या पुरुषों का मधुरस्वर, (स्त्रियों के लिए पुरुषों की और पुरुषों के लिए स्त्रियों की मीठी-मीठी बातें) आदि चक्षु एवं कान के विषय हैं| Continue reading “कामासक्ति” »

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Quote #8

The ship is safest when it is in port, but that's not what the ship was built for.
Unknown
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कीचड़ में न फँसें

कीचड़ में न फँसें

महयं पलिगोव जाणिया, जा वि य वंदणपूयणा इहं

संसार में जो वन्दन पूजन (सन्मान) है, साधक उसे महान दलदल समझे

प्रशंसा पाने का भी एक नशा होता है| नशे में जैसे आदमी औचित्य का विचार किये बिना मनमाना काम करता रहता है; वैसे ही प्रशंसा का भूखा व्यक्ति भी औचित्य की मर्यादा भूलकर जिस कार्य से अधिक प्रशंसा मिले, वही कार्य करने लगता है| Continue reading “कीचड़ में न फँसें” »

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तेरी हुं तेरी हुं कहुं री

Listen to तेरी हुं तेरी हुं कहुं री

तेरी हुं तेरी हुं कहुं री,
इन बातमें दगो तुं जाने
तो करवत काशी जाय ग्रहुं री.

…तेरी.१

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पीछे नहीं…आगे देखिए

पीछे नहीं...आगे देखिए
अतीत का महत्त्व है इससे इन्कार नहीं है| उसे यूँ ही भुलाकर नहीं रहा जा सकता… परन्तु कदम-कदम पर अतीत की दुहाई देना… उसी से चिपटे रहना स्वयं को खतरे में डालना है| अतीत की स्मृति भले ही रहे परन्तु दृष्टि तो भविष्य की ओर केन्द्रित रहनी चाहिए…| हम क्या थे इसकी अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण यह देखना है कि अब हमें क्या बनना है?

समय के साथ आगे चलना और देखना जरूरी है| पिछले समय से तो मात्र शिक्षा लेनी चाहिए… यदि मनुष्य का पीछे की ओर देखना जरूरी होता तो आँखें आगे की बजाय पीछे होती| कहा जाता है कि भूत के पैर पीछे की ओर उलटे होते हैं… अतः इस बात को याद रखकर आगे बढ़ना|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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परलोक में

परलोक में

इहलोगे सुचिण्णा कम्मा परलोगे
सुहफल विवाग संजुत्ता भवन्ति

इस लोक में किये हुए सत्कर्म परलोक में सुखप्रद होते हैं

जिन अच्छे कार्यों का सुफल इस लोक में अर्थात् इस भव में नहीं मिल पाता, उनका सुफल अगले भव में अथवा परलोक में प्राप्त होता है| Continue reading “परलोक में” »

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