विरता हु न लग्गंति,
जहा से सुक्कगोलए
जहा से सुक्कगोलए
मिट्टी के सूखे गोले के समान विरक्त साधक कहीं भी चिपकता नहीं है
मिट्टी के सूखे गोले के समान विरक्त साधक कहीं भी चिपकता नहीं है
जब तक शरीरभंग (मृत्यु) न हो तब तक गुणाकांक्षा रहनी चाहिये
विषयों की तो सभी प्राणी कामना करते रहते हैं; किंतु विवेकी व्यक्ति गुणों की कामना करते हैं| Continue reading “गुणाकांक्षा” »
आत्मसाधक ममत्व के बन्धन को तोड़ फेंके; जैसे महानाग कञ्चुक को उतार देता है