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सहिष्णुता

सहिष्णुता

पियमप्पियं सव्वं तितिक्खएज्जा

प्रिय हो या अप्रिय-सबको समभाव से सहना चाहिये

सदा प्रिय वस्तुओं का ही संयोग नहीं होता – सर्वत्र प्रशंसा ही प्राप्त नहीं होती – सभी लोक कोमल मीठे वचन ही नहीं बोला करते; किन्तु हमें अनेक बार अप्रिय वस्तुएँ भी प्राप्त होती हैं – हमारी निन्दा भी होती है – कठोर शब्दों को सुनने का अवसर आता है; सबकुछ समभावपूर्वक हमें सहना चाहिये – ऐसा वीतरागदेवों का आदेश है| सहिष्णुता वीरता का प्रतीक है और असहिष्णुता कायरता का| Continue reading “सहिष्णुता” »

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आत्मविजय

आत्मविजय

सव्वं अप्पे जिए जियं

अपने को जीतने पर सबको जीत लिया जाता है

अपने को जीतने का अर्थ है – मन को जीतना – मनोवृत्तियों को अपने वश में रखना| Continue reading “आत्मविजय” »

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बोधिरत्न की सुदुर्लभता

बोधिरत्न की सुदुर्लभता

बहुकम्मलेवलित्ताणं बोही
होइ सुदुल्लहा तेसिं

जो आत्माएँ बहुत अधिक कर्मों से लिप्त हैं, उनके लिए बोधि अत्यन्त दुर्लभ है

प्रत्येक संसारी जीव कर्मों से लिप्त है| कर्मों का यह लेप जिस जीव पर जितना अधिक चढ़ा हुआ है, वह उतना ही अधिक दूर रहता है – सम्यग्ज्ञान से| Continue reading “बोधिरत्न की सुदुर्लभता” »

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