वुच्चमाणो न संजले
साधक को कोई यदि दुर्वचन कहे; तो भी वह उस पर क्रोध न करे
साधक को कोई यदि दुर्वचन कहे; तो भी वह उस पर क्रोध न करे
तू, तुम जैसे अमनोहर शब्द कभी नहीं बोलें
संसार में जो वन्दन पूजन (सन्मान) है, साधक उसे महान दलदल समझे
जो परिग्रह में व्यस्त हैं, वे संसार में अपने प्रति वैर ही बढ़ाते हैं
यदि जलस्पर्श (स्नान) से ही सिद्धि प्राप्त होती तो बहुत-से जलजीव सिद्ध हो जाते
एक ही झपाटे में जैसे बाज बटेर को मार डालता है, वैसे ही आयु क्षीण होने पर मृत्यु भी जीवन को हर लेती है
आत्महित का अवसर मुश्किल से मिलता है
सूर्य के उदय होने पर भी आँख से ही देखा जा सकता है
यथावसर संचित धन को तो अन्य व्यक्ति उड़ा लेते हैं और परिग्रही को अपने पापकर्मों का दुष्फल स्वयं भोगना पड़ता है
साधक कामी बनकर कामभोगों की कामना न करे| उपलब्ध को भी अनुपलब्ध समझे| प्राप्त भोगों पर भी उपेक्षा करे|