1 0 Archive | जैन स्तोत्र RSS feed for this section
post icon

कायोत्सर्ग

कायोत्सर्ग

वोसिरे सव्वसो कायं, न मे देहे परीसहा

सर्वथा काया को मोह छोड़ता हूँ – मेरी देह पर कोई परीषह जैसे है ही नहीं

‘काउसग्ग’ एक पारिभाषिक शब्द है, जिसे संस्कृत में ‘कायोत्सर्ग’ कहते हैं| यह शब्द काया+उत्सर्ग से बना है| काया शरीर को कहते हैं और उत्सर्ग त्याग को; परन्तु कायोत्सर्ग का अर्थ ‘शरीर का त्याग’ नहीं है| इसका अर्थ है शरीर के मोह का त्याग| कायोत्सर्ग के बाद ही ध्यान में एकाग्रता आ सकती है| Continue reading “कायोत्सर्ग” »

Leave a Comment
post icon

न भाषा न पांडित्य

न भाषा न पांडित्य

न चित्ता तायए भासा
कुओ विज्जाणुसासणं

विचित्र (लच्छेदार) भाषाएँ भी (दुराचारी की दुर्गति से) रक्षा नहीं कर सकतीं, फिर विद्यानुशासन (पाण्डित्य) की तो बात ही क्या?

भाषाज्ञान और विद्यानुशासन में बहुत अन्तर है| एक आदमी एक ही भाषा जानता हो; फिर भी वह विद्यानुशासित अर्थात् पण्डित हो सकता है; परन्तु कोई अन्य आदमी अनेक भाषाओं का ज्ञाता होकर भी मूर्ख हो सकता है| भाषाओं की जानकारी से ज्ञान नहीं बढ़ता| Continue reading “न भाषा न पांडित्य” »

Leave a Comment
Page 27 of 27« First...1020...2324252627