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वेदों का अध्ययन

वेदों का अध्ययन

वेया अहीया न भवन्ति ताणं

अध्ययन किये गये वेद रक्षा नहीं कर सकते

अमुक व्यक्ति वेदों का पारायण करता है – अध्ययन करता है; इसलिए आदरणीय है – पूज्य है – पवित्र है – ऐसा मानना भ्रमपूर्ण है| क्यों? ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि आदरणीयता, पूज्यता एवं पवित्रता का सम्बन्ध सच्चरित्रता से है, त्याग से है, परोपकार से है, सदाचार से है; वेदों के अध्ययन से नहीं|

वेदों का अध्ययन तो कहते हैं, रावण ने भी किया था; इतना ही नहीं, कहा तो यहॉं तक जाता है कि उसने उन पर भाष्य भी लिखा था; परन्तु आचरण ठीक न होने से वह आदरणीय नहीं बन सका| कोई भी व्यक्ति अपना या अपने बच्चे का नाम ‘रावण’ रखना पसन्द नहीं करता| रामलाल, रामचन्द्र, रामसिंह, रामनारायण, रामेश्‍वर, रामप्रसाद, रामदास, रामप्रताप आदि तो आपको प्रत्येक गॉंव में सैकड़ों मिल जायेंगे; परन्तु रावणलाल आदि एक भी नहीं मिलेगा| इससे क्या सिद्ध होता है?

यही कि वेदों का अध्ययन भी हमारे नाम की या हमारे सन्मान की सुरक्षा नहीं कर सकता; जब तक जीवन में पवित्रता न हो – सदाचार न हो|

- उत्तराध्ययन सूत्र 14/12

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