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भवतृष्णा का त्याग

भवतृष्णा का त्याग

भवतण्हा लया वुत्ता, भीमा भीमफलोदया

संसार की तृष्णा भयंकर फल देनेवाली एक भयंकर लता है

भवतण्हा तृष्णा अर्थात् संसार के प्रति आसक्ति एक लता है – ऐसी भयंकर लता, जिसमें भयंकर फल उत्प होते हैं|

लता हरी-भरी होती है, सुन्दर होती है, मनोहर होती है| भवतृष्णा भी लता की तरह सुन्दर और मनोहर होती है|

लता जिस प्रकार पेड़ का सहारा पाकर धीरे-धीरे उस पर चढ़कर फैल जाती है; उसी प्रकार भवतृष्णा भी व्यक्ति का सहारा पाकर धीरे-धीरे मन पर सवार होकर फैल जाती है – आत्मा पर छा जाती है|

लता जिस प्रकार वृक्ष का रस चूस कर पुष्ट होती है; उसी प्रकार भवतृष्णा भी प्राणी का आनन्द चूस कर स्वयं पुष्ट होती रहती है; इसलिए लता की तरह भवतृष्णा हानिकर है, भयंकर है|

लता की संगति से पेड़ का शोषण होता है| उस पर लगे हुए फल उस भयंकर शोषण के ही सूचक हैं| पेड़ के स्वस्थ विकास के लिए लता का त्याग आवश्यक है| आत्मा के भी स्वस्थ विकास के लिए भवतृष्णा का त्याग आवश्यक है|

- उत्तराध्ययन सूत्र 23/48

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