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मनुष्यभव

मनुष्यभव

जीवा सोहिमणुप्पत्ता, आययन्ति मणुस्सयं

सांसारिक जीव क्रमशः शुद्ध होते हुए मनुष्यभव पाते हैं

जीव शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप विभिन्न योनियों में जन्म लेते हैं| ऐसी योनियों की संख्या शास्त्रों में चौरासी लाख बताई गयी है| मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ मानी गई है; क्योंकि यहीं से सिद्धपद की प्राप्ति हो सकती है – मोक्ष की साधना हो सकती है|

अन्य योनियों में भी तरतमता होती है| जीव ज्यों ज्यों शुभकर्मों द्वारा शुद्ध होता रहता है, त्यों-त्यों उसे उत योनि प्राप्त होती रहती है| भूल से अशुभ कर्मों का उपार्जन होने पर निम्न या नीच योनि में भी जन्म लेना पड़ सकता है| पहाड़ पर चढ़ते समय लगातार ऊँचाई नहीं मिलती | कहीं कहीं नीचे भी उतरना पड़ता है – गिरकर उठना और उठ-उठ कर चलना पड़ता है| यही बात विविध योनियों में जन्म लेने के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है|

यदि मनुष्य विवेकी बनकर अशुभ कर्मों से बचता हुआ लगातार शुभ कर्मों का ही उपार्जन करता रहे; तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस प्रकार होनेवाली क्रमशः अधिकाधिक आत्म-शुद्धि के द्वारा वह मनुष्य भव अवश्य प्राप्त करेगा|

- उत्तराध्ययन सूत्र 3/7

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