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धर्मानुकूल आजीविका

धर्मानुकूल आजीविका

धम्मेणं चेव वित्तिं कप्पेमाणा विहरंति

सद्गृहस्थ धर्मानुकूल ही आजीविका करते हैं

जीवित रहने के लिए अन्न और जल चाहिये – कुटुम्ब का पोषण करने के लिए धन चाहिये| मुनियों की बात दूसरी है; परन्तु जो गृहस्थ है, उन्हें तो इस संसार में पद पद पर सम्पत्ति की आवश्यकता होती है| कहते हैं – जिस मुनि के पास कौड़ी (एक पैसा भी) हो, वह कौड़ी का और जिस गृहस्थ के पास कौड़ी न हो, वह भी कौड़ी का !

परन्तु धन या पैसा जुटाने के लिए जो काम करना पड़ता है, उसे वृत्ति या आजीविका कहते है| आजीविका की इस प्रवृत्ति में हिंसा न हो – झूठ न हो – धोखा न हो – कोई पाप न हो; तो प्रवृत्ति शुद्ध कहलायेगी – धर्मानुकूल कहलायेगी|

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – ये चार पुरुषार्थ कहलाते हैं| इनमें सबसे पहला धर्म ही है| अर्थ उसके बाद रखा गया है| जीवन में धर्म की आवश्यकता मुख्य है, अर्थ की गौण| अर्थ (संपत्ति) न्यायोपार्जित हो-धर्मानुकूल हो, तभी वह पवित्र होगा – यही इस क्रम से सूचित होता है | सद्गृहस्थों की आजीविका सदा धर्मानुकूल होती है|

- सूत्रकृतांग सूत्र 2/2/36

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