post icon

न तृप्ति, न तृष्टि

न तृप्ति, न तृष्टि

देवावि सइंदगा न तित्तिं न तुट्ठिं उवलभन्ति

इन्द्रों सहित देव भी (विषयों से) न कभी तृप्त होते हैं, न सन्तुष्ट

पॉंच इन्द्रियॉं हैं और उनके अलग-अलग विषय हैं| जीवनभर जीव विषय-सामग्री को जुटाने के लिए दौड़-धूप करता रहता है| एक इन्द्रिय के विषय जुटाने पर दूसरी इन्द्रिय के और दूसरी के बाद तीसरी, चौथी और पॉंचवी इन्द्रिय के विषय क्रमशः जुटाने पड़ते हैं| तब तक पहली इन्द्रिय फिर से अपने विषय की मॉंग करने लगती है| इस प्रकार इन्द्रियों के विषय जुटाते-जुटाते प्राणी परेशान हो जाता है; परन्तु किसी भी इन्द्रिय को वह सदा के लिए सन्तुष्ट नहीं कर पाता| फिर विषयों से जो सुख प्राप्त होता है, वह भी क्षणिक ही होता है, स्थायी नहीं|

सच्चा सुख तो वही होता है, जिसका नाश नहीं होता| ऐसा सुख विषयभोग से नहीं; किन्तु विषय-विरक्ति से ही प्राप्त हो सकता है|

प्राणियों को तो संसार में विषय-सामग्री जुटानी पड़ती है; परन्तु स्वर्ग में देवों और इन्द्रों को तो समस्त इन्द्रियों के लिए विविध विषय-सामग्री सहज ही सम्प्रास होती है; फिर भी ज्ञानी कहते हैं कि इन्द्रों सहित देव भी विषयभोगों से कभी तृप्ति या तुष्टि का अनुभव नहीं कर सकते, फिर प्राणियों की तो बात ही क्या है?

- प्रश्‍नव्याकरण 1/5

Did you like it? Share the knowledge:


Advertisement

No comments yet.

Leave a comment

Leave a Reply

Connect with Facebook

OR