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मृदुता को अपनाइये

मृदुता को अपनाइये

माणं मद्दवया जिणे

मान को नम्रता या मृदुता से जीतें

आँधी बड़े-बड़े पेडों को उखाड़ फैंकती है; किंतु मैदान में फैली हुई दूब का कुछ नहीं बिगाड़ सकती| ऐसा क्यों? पेड़ घमण्ड से अकड़े हुए रहते हैं, किंतु दूब में नम्रता होती है अर्थात् मृदुता होती है| अकड़ से पेड़ उखड़ जाते हैं, नम्रता से दूब टिकी रहती है| वह अभिमानी व्यक्तियों का मार्गदर्शन करती है कि उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिये|

अभिमान पर भी हमें विजय पानी है और अभिमानी पर भी| दोनों प्रकार की विजय में विनय अपेक्षित है| विनय से ही सर्वत्र विजय पायी जा सकती है|

अभिमानी के सामने अभिमान का प्रदर्शन करने से समस्या और भी उलझ सकती है| इसके विपरीत अभिमानी के सामने विनय का प्रयोग करने से उसका अभिमान कुछ कम होगा और विनीत के सुव्यवहार को देखकर अभिमानी का भी हृदय प्रभावित होगा| उसमें भी विनय के अंकुर जमेंगे और तब अभिमानी को अपनी भूल का भान होगा| यह विनीत की अभिमानी पर विजय ही तो है?

इसी प्रकार अपने अभिमान पर विजय पाने के लिए हमें विनय का सहारा लेना चाहिये| अभिमान से सारे गुण घटते चले जाते हैं और मृदुता से सारे सद्गुण बढ़ते हैं – पुष्ट होते हैं; अतः अभिमान का नाश करके सद्गुणी बनना हो तो मृदुता को अपनाइये|

- दशवैकालिक सूत्र 8/36

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