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हिंसा न करें

हिंसा न करें

सव्वेसिं जीवियं पियं,
नाइवाएज्ज कंचणं

सबको जीवन प्रिय है, किसीके प्राणों का अतिपात नहीं चाहिये

कौन प्राणी है, जो जीवित रहना नहीं चाहता? अपना-अपना जीवन सभीको प्यारा लगता है| मनुष्य का जीवन कितना मूल्यवान् है – इसका पता तब लगता है, जब उसके सामने एक ओर करोड़ों स्वर्णमुद्राओं के साथ उसकी मृत्यु तथा दूसरी ओर साधारण अबल के साथ उसका जीवन रखकर इनमें से किसी एक का चयन करने के लिए उसे कहा जाये| निश्‍चय ही करोड़ों स्वर्णमुद्राओं को लात मारकर अपने लिए वह साधारण अजल सहित ‘जीवन’ चुनेगा?

जब जीवन इतना मूल्यवान् है, तब तुच्छ स्वार्थ के लिए हमें क्यों किसी के प्राणों का वध करना चाहिये? क्यों हिंसा के द्वारा पाप का उपार्जन कर अपनी आत्मा को कलुषित करना चाहिये? ज्ञानियों के अनुसार सबके लिए श्रेयस्कर यही है कि ‘जीवन सबको प्रिय है’ – ऐसा जानकर हम कभी किसी प्राणी की हिंसा न करें!

- आचारांग सूत्र 1/2/3

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