1 0 Tag Archives: जैन सूत्र
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असंवृत्तों का मोह

असंवृत्तों का मोह

मोहं जंति नरा असंवुडा

असंवृत मनुष्य मोहित हो जाते हैं

जो असंयमी हैं – इन्द्रियों को जो अपने वश में नहीं रख सकते – मन पर जिनका बिल्कुल अधिकार नहीं है; ऐसे लोग विषयों के प्रति शीघ्र आकर्षित हो जाते हैं| Continue reading “असंवृत्तों का मोह” »

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आतङ्कदर्शी

आतङ्कदर्शी

आयंकदंसी न करेइ पावं

आतंकदर्शी पाप नहीं करता

संसार में ऐसा कौन प्राणी है, जो दुःखी न हो? कोई न कोई दुःख प्रत्येक जीव के पीछे लगा ही रहता है| जन्म का, मृत्यु का और बुढ़ापे के दुःख तो अनिवार्य है ही; जिस का सबको अनुभव करना पड़ता है; परन्तु इसके अतिरिक्त रोग, शोक, वियोग, अपमान, चोट, जलन, कटु शब्द, करूपता, दुर्गन्ध, बेस्वाद भोजन, कठोर स्पर्श, बन्धन, निर्धनता, तिरस्कार, मालिक की फटकार, दौड़धूप आदि सैकड़ों दुःख हैं; जिनसे प्राणी निरन्तर कष्ट पा रहे हैं, व्याकुलता का अनुभव कर रहे हैं, छटपटा रहे हैं| Continue reading “आतङ्कदर्शी” »

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कर्त्ता – भोक्ता

कर्त्ता   भोक्ता

अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण या सुहाण च

आत्मा ही सुख दुःख का कर्त्ता और भोक्ता है

सुख और दुःख अपने ही कार्यों एवं विचारों के फल हैं; दूसरों के नहीं|

हम अच्छे कार्य करते हैं; तो अपने लिए सुख का निर्माण करते हैं और यदि बुरे कार्य करते हैं; तो दुःख का निर्माण करते हैं| इस प्रकार हम स्वयं ही सुख-दुःख के निर्माता हैं, बनाने वाले हैं| Continue reading “कर्त्ता – भोक्ता” »

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समझ लीजिये

समझ लीजिये

संबुज्झह, किं न बुज्झह?
संबोही खलु पेच्च दुल्लहा

समझो! क्यों नहीं समझते मरने पर संबोध निश्‍चित रूप से दुर्लभ है

अपने अपने शुभाशुभ कर्मों का भोग करते हुए प्राणी इस संसार में चौरासी लाख योनियों में जन्म लेते और मरते रहते हैं| मनुष्य मर कर मनुष्य के रूप में ही जन्म लेता है – ऐसा निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता| Continue reading “समझ लीजिये” »

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लाभ – अलाभ

लाभ   अलाभ

लाभुत्ति न मज्जिज्जा, अलाभुत्ति न सोइज्जा

लाभ होने पर घमण्ड में फूलना नहीं चाहिये और लाभ न होने पर शोक नहीं करना चाहिये

प्रयत्न के दो ही परिणाम होते हैं – लाभ या अलाभ| प्रयत्न सफल होने पर लाभ होता है और असफल होने पर अलाभ| लाभ से प्रयत्न की प्रेरणा मिलती हैऔर अलाभ से प्रयत्न में शिथिलता आती है; परन्तु इसके साथ ही साथ दोनों अवस्थाओं में एक-एक दुष्परिणाम भी होता है| Continue reading “लाभ – अलाभ” »

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क्रुद्ध न हों

क्रुद्ध न हों

अणुसासिओ न कुप्पिज्जा

अनुशासन से क्रुद्ध नहीं होना चाहिये

माता-पिता एवं गुरुजन हमसे बड़े होते हैं – अधिक अनुभवी होते हैं| वे हमें सुधारने के लिए – कुमार्ग से हटा कर हमें सुमार्ग पर ले जाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं| इस प्रयत्न के सिलसिले में अनेक बार वे हमारी आलोचना करते हैं- अनेक बार हमारे दोष बताते हैं और उनसे बचने का उपदेश देते हैं| बार-बार एक ही अपराध करने पर वे हमें डॉंट-फटकार भी बताते हैं अर्थात् ताड़ना-तर्जना भी करते हैं| Continue reading “क्रुद्ध न हों” »

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प्रेम का नाशक

प्रेम का नाशक

कोहो पीइं पणासेइ

क्रोध प्रीति का नाशक है

प्रेम और क्रोध दोनों किसी स्थान पर एक साथ नहीं रह सकते | जब क्रोध होगा, प्रेम नहीं होगा और जब प्रेम होगा, क्रोध नहीं होगा| दोनों गुण एक दूसरे के विरोधी हैं – एक दूसरे के नाशक हैं| Continue reading “प्रेम का नाशक” »

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अभयदान

अभयदान

दाणाण सेट्ठं अभयप्पयाणं

अभयदान श्रेष्ठ दान है

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