1 0 Tag Archives: जैन सूत्र
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सदाचार का मूल

सदाचार का मूल

नादंसणिस्स नाणं, नाणेण विणा न होंति चरणगुणा

सम्यग्दर्शन के अभाव में ज्ञान प्राप्त नहीं होता और ज्ञान के अभाव में चारित्र-गुण प्राप्त नहीं होते

दृष्टि यदि सम्यक् न हो तो मनुष्य सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता; क्यों कि जबतक दृष्टि सम्यक् परक नहीं होगी, सम्यक् की खोज नहीं की जा सकेगी और इसके लिए आवश्यक होगा कि दृष्टि स्वयं भी सम्यक् हो| सम्यग्ज्ञान से पहले सम्यग्दर्शन होना चाहिये| Continue reading “सदाचार का मूल” »

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दुःखप्रदायकता

दुःखप्रदायकता

सव्वे कामा दुहावहा

सभी काम दुःखप्रद होते हैं

यहॉं ‘काम’ शब्द का अर्थ कार्य नहीं हैं, तीसरा पुरुषार्थ है| हिन्दी में काम शब्द दोनों अर्थों में प्रचलित है| इस सूक्ति में कामनाओं के त्याग का परामर्श दिया गया है और इसका कारण बताया है – उनकी दुःखदायकता| Continue reading “दुःखप्रदायकता” »

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मायामृषावाद

मायामृषावाद

सादियं न मुसं बूया

मन में कपट रखकर झूठ नहीं बोलना चाहिये

झूठ बोलना बुरा है; परन्तु उसकी बुराई की मात्रा का निर्णय तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक यह पता नहीं लग जाता कि झूठ बोलने का कारण और प्रयोजन क्या है| Continue reading “मायामृषावाद” »

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साधुओं की प्रसन्नता

साधुओं की प्रसन्नता

महप्पसाया इसिणो हवंति

ऋषि सदा प्रसन्न रहते हैं

जीवन में परिस्थियॉं कभी अनुकूल रहती हैं और कभी प्रतिकूल | प्रतिकूल परिस्थियों में जो धीरज खो देते हैं अर्थात् जिनका मानसिक सन्तुलन नष्ट हो जाता है, वे प्रसन्न नहीं रह सकते| जो अपने मन को क्षणिक सुख देनेवाली विषय-सामग्री एकत्र करने में लगा देते हैं, वे भी सदा अशान्त रहते हैं| Continue reading “साधुओं की प्रसन्नता” »

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तप से पूजा की कामना न करें

तप से पूजा की कामना न करें

नो पूयणं तवसा आवहेज्जा

तप के द्वारा पूजा (प्रतिष्ठा) की अभिलाषा नहीं करनी चाहिये

कल्पना कीजिये – एक नौका में बैठकर कुछ यात्री नदी पार कर रहे हैं| वे देखते हैं कि नौका में पानी भरने लगा है और इससे धीरे-धीरे नौका डूबने की सम्भावना पैदा हो गई है| वे तत्काल नौका के छिद्रों को ढूँढते हैं, जहॉं से पानी भीतर प्रवेश कर रहा है| Continue reading “तप से पूजा की कामना न करें” »

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अपराजेय शत्रु

अपराजेय शत्रु

एगप्पा अजिए सत्तू

एक असंयत आत्मा ही अजित शत्रु है

अपना शत्रु कौन है ?

जिसे हम अपना शत्रु समझते हैं| Continue reading “अपराजेय शत्रु” »

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जीव और शरीर

जीव और शरीर

ओ जीवो अं सरीरं

जीव अन्य है, शरीर अन्य

‘‘मैं’’ शब्द से आत्मा या जीव का प्रत्यभिज्ञान होता है; इसलिए कुछ लोग ‘‘मै अन्धा हूँ’’ आदि प्रयोग देखकर इन्द्रियों को ही आत्मा मान बैठते हैं| कुछ लोग ‘‘मैं दोड़ता हूँ’’, ‘‘मैं बीमार हूँ’’, ‘‘मैं कपड़े धोता हूँ’’, ‘‘मैं स्नान करता हूँ’’, आदि प्रयोगों के आधार पर शरीर को ही आत्मा मान लेते हैं| Continue reading “जीव और शरीर” »

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पाप न करें, न करायें

पाप न करें, न करायें

पावकम्मं नेव कुज्जा न कारवेज्जा

पापकर्म न स्वयं करना चाहिये और न दूसरों से कराना चाहिये

पुण्य का फल सुख है और पाप का फल दुःख | सुख सब चाहते हैं, फिर भी पुण्य करने में आलसी बनते हैं और दुःख कोई नहीं चाहता, फिर भी सावधानी पूर्वक दुःख के कारणों का अर्थात् पापों का सेवन करते हैं| कैसी विचित्र बात है यह? Continue reading “पाप न करें, न करायें” »

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मूर्ख की संगति न करें

मूर्ख की संगति न करें

अलं बालस्स संगेणं

बाल (अज्ञानी या मूर्ख) की संगति नहीं करनी चाहिये

यह एक अनुभूत तथ्य है कि साथ रहनेवालों पर परस्पर एक-दूसरे का प्रभाव पड़ता है| यदि साथी व्यसनी होगा; तो हम भी व्यसनी बन जायेंगे – यदि वह बुद्धिमान होगा तो हमें भी बुद्धिमान बना देगा – यदि वह विद्वान होगा तो हमें भी विद्वान बनने के लिए प्रेरित करेगा| Continue reading “मूर्ख की संगति न करें” »

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विचारपूर्वक बोलें

विचारपूर्वक बोलें

अणुवीइभासी से निग्गंथे

जो विचारपूर्वक बोलता है, वही निर्ग्रन्थ है

बोली से या बातचीत से ही पता लगता है कि कौन मूर्ख है और कौन विद्वान| दोनों में अन्तर क्या है? Continue reading “विचारपूर्वक बोलें” »

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