1 0 Tag Archives: जैन सिद्धांत
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शीशा

शीशा

ईश्‍वर ने हमें केवल एक चेहरा दिया है और दूसरा हम स्वयं बना लेते हैं

नीना बड़ी गुस्सैल और बदमिजाज लड़की थी| अक्सर नीना की मॉं उसे ऐसी आदतों से छुटकारा पाने के लिए समझाती; पर नीना थी कि उस पर किसी बात का असर ही नहीं होता था| Continue reading “शीशा” »

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पर्युषण महापर्व – कर्तव्य पहला

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य पहला

“कर्तव्य पहला – अमारि प्रवर्तन”

धर्मका मूल दया है -

दया धर्मका मूल है, पापमूल अभिमान,
तुलसी दया न छोड़ीये, जब लग घटमें प्राण||

जब दया जीवनकर्तव्य है, तब पर्युषण का तो महाकर्तव्य बनता ही है| इसे प्रथम नंबर का कर्तव्य समझना, क्योंकि दयासे अपना हृदय मृदु-कोमल बनता है और कोमल हृदयमें दूसरे सभी धर्म अच्छी तरह से बास कर सकते हैं| भूमि को जोतकर मुलायम बनायी हो, तो ही उसमें बीज को बोया जा सकता है| इसलिए यहॉं पर्युषणमें दया-अमारि प्रवर्तन का पहला कर्तव्य पालन करके हृदयको कोमल-मुलायम सा बनाना है, जिससे उसमें साधर्मिक भक्ति, क्षमापना, त्याग, तपश्चर्यादि धर्मो को बोया जा सके| Continue reading “पर्युषण महापर्व – कर्तव्य पहला” »

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जीने की विधि

जीने की विधि

पक्षं कञ्चन नाश्रयेत्
या तो अकेले ही जीने की कला सीख लेनी चाहिए या फिर सहजीवन – समूहजीवन जीने का तरीका समझ लेना चाहिए| Continue reading “जीने की विधि” »

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पृथ्वीकाय की जयणा

पृथ्वीकाय की जयणा
मिट्टी, पत्थर, खनिज, धातुयें, रत्न इ. पृथ्वीकाय के शरीर हैं| गम- नागमन से, वाहन-व्यवहार से, अन्य शस्त्र संस्कार इत्यादि से पृथ्वीकाय अचित्त बनते हैं| जीवन व्यवहार में निरर्थक सचित्त पृथ्वीकाय की विराधना (हिंसा) न हो जाये उसकी सावधानी रखनी चाहिए| Continue reading “पृथ्वीकाय की जयणा” »

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आज भी प्रायश्चित्त विधि है

आज भी प्रायश्चित्त विधि है
यदि कोई आत्मा कहती है कि आज इस काल में प्रायश्‍चित्त नहीं है, प्रायश्‍चित्त देने वाले नहीं है, इस प्रकार बोलने वाली आत्मा दीर्घसंसारी बनती है, क्योंकि नौवें पूर्व की तृतीय वस्तु में से उद्धृत आचार कल्प, व्यवहार सूत्र आदि प्रायश्‍चित्त के ग्रंथ एवं वैसे गंभीर गुरुवर आज भी विद्यमान हैं|

गुरुदेव से शुद्ध आलोचना लेने पर अपनी आत्मा हल्की हो जाती है, जैसे माथे से भार उतारने के पश्‍चात् भारवाहक स्वमस्तक अत्यंत हल्का महसूस करता है| वंदित्तु सूत्र में कहा है कि -

कयपावो वि मणुस्सो आलोइय निंदिय गुरुसगासे|
होई अइरेगलहुओ ओहरिय भरुव्व भारवहो
Continue reading “आज भी प्रायश्चित्त विधि है” »

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जीव विचार – गाथा 2

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आदत क्यों नहीं छूटती?

आदत क्यों नहीं छूटती?
हमारा यह पूरा जीवन मात्र आदतों के प्रभाव और दबाव से चल रहा है| हम भोजन, स्नान, पढ़ना, सोना, जागना, दैनिक क्रियाएं करना आदि सब आदत से करते हैं…| Continue reading “आदत क्यों नहीं छूटती?” »

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आलोचना-प्रायश्चित्त लेकर शुद्ध बनी पुष्पचूला

आलोचना प्रायश्चित्त लेकर शुद्ध बनी पुष्पचूला
पुष्पभद्र नगर में पुष्पकेतु नाम का राजा था| उसकी पुष्पवती नाम की रानी थी| उसने पुष्पचूल और पुष्पचूला नाम के युगल को जन्म दिया| पुष्पचूल और पुष्पचूला परस्पर अत्यन्त प्रेम से बड़े हुए| दोनों एक दूसरे से अलग नहीं रह सकते थे| अब राजा विचार करने लगा कि यदि पुत्री पुष्पचूला का विवाह अन्यत्र करूँगा, तो दोनों का वियोग हो जाएगा| अतः उसने प्रजाजनों की सभा बुलाई| सभा में पुष्पकेतु राजाने प्रश्‍न किया कि अगर मेरी धरती पर रत्न उत्पन्न हो जाये, तो उसे कहॉं जोड़ना, यह अधिकार किसका है? Continue reading “आलोचना-प्रायश्चित्त लेकर शुद्ध बनी पुष्पचूला” »

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पर्युषण महापर्व – कर्तव्य दूसरा

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य दूसरा

कर्तव्य दूसरा – साधर्मिक भक्ति

द्वितीय कर्त्तव्य… साधर्मिक भक्ति ‘‘मेरा सो मेरा ही’’ ऐसी स्वार्थ वृत्ति को दूर करता है| बुद्धिनिधान अभयकुमार नामक साधर्मिक ने कालसौरिक कसाइर्२ के पुत्र सुलस को जैनधर्म-अहिंसा की प्रेरणा देकर हिंसक धंधे से दूर होने के लिए जोर-बल दिया था| मृत्यु के समय भाई के प्रति द्वेष रखने के कारण नरकमें जाकर संसार वनमें भटकने के लिए तैयार युगबाहु को पत्नी मदनरेखाने कल्याणमित्र की भूमिका बजा कर-सच्चा रिश्ता साधर्मिक का इस बात को सिद्ध करके… भाई के प्रति वैरभाव से जो असमाधि उत्पन्न हुई थी, उसको दूर करके सद्गति दिलाई और संसारमें भटकने से बचा लिया था| Continue reading “पर्युषण महापर्व – कर्तव्य दूसरा” »

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फफूंदी/फूलन/फूग की रक्षा करो

फफूंदी/फूलन/फूग की रक्षा करो
1. खाद्य पदार्थों को चुस्त (टाईट) ढक्कन वाले साधन में बंद करके रखिए|

2. फुग उत्पन्न हो ऐसे पदार्थो को नमी के वातावरण में मत रखिए| डिब्बे में से कोई वस्तु लेते समय हाथ जरा भी गीले न हों, इसका ध्यान रखिए|
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