जिसके विषय में पूरी जानकारी न हो, उसके विषय में ‘‘यह ऐसा ही है’’ ऐसी बात न कहें
जान कर बोलें
जमट्ठं तु न जाणेज्जा, एवमेयंति नो वए
जिस विषय में हमें पूरी जानकारी न हो, उस विषय में निश्चय पूर्वक कोई बात नहीं कहनी चाहिये, अन्यथा सुनने वालों को जब अन्य स्त्रोतों से यथार्थ ज्ञान हो जायेगा, तब हमारी स्थिति उपहासास्पद बन जायेगी| लोग हम पर विश्वास ही नहीं करेंगे| Continue reading “जान कर बोलें” »
इच्छानिरोध
छंदं निरोहेण उवेइ मोक्खं
इच्छाओं को रोकने से ही मोक्ष प्राप्त होता है
चार श्रावक
चत्तारि समणोवासगा-अद्दागसमाणे,
पडागसमाणे, ठाणुसमाणे, खरकंटगसमाणे
पडागसमाणे, ठाणुसमाणे, खरकंटगसमाणे
श्रमणोपासक चार प्रकार के होते हैं – दर्पण के समान (स्वच्छ हृदय वाले), पताका के समान (चञ्चल हृदय वाले), स्थाणु के समान (दुराग्रही) और तीक्ष्ण कण्टक के समान (कटुभाषी)
आयु घट रही है|
सेणे जह वट्टयं हरे, एवं आउखयंमि तुट्टइ
एक ही झपाटे में जैसे बाज बटेर को मार डालता है, वैसे ही आयु क्षीण होने पर मृत्यु भी जीवन को हर लेती है
आत्महित का अवसर
अत्तहियं खु दुहेण लब्भइ
आत्महित का अवसर मुश्किल से मिलता है
दुरुक्त कैसा होता है ?
वाया दुरुत्ताणि दुरुद्धराणि,
वेराणुबंधीणि महब्भयाणि
वेराणुबंधीणि महब्भयाणि
वाणी से बोले हुए दुष्ट और कठोर वचन जन्मजन्मान्तर के वैर और भय के कारण बन जाते हैं
विरक्त साधक
विरता हु न लग्गंति,
जहा से सुक्कगोलए
जहा से सुक्कगोलए
मिट्टी के सूखे गोले के समान विरक्त साधक कहीं भी चिपकता नहीं है
धर्माचार्य को वन्दन
जत्थेव धम्मायरियं पासेज्जा,
तत्थेव वंदिज्जा नमंसिज्जा
तत्थेव वंदिज्जा नमंसिज्जा
जहॉं कहीं भी धर्माचार्य दिखाई दें, वहीं उन्हे वन्दना नमस्कार करना चाहिये
अनुभव से सच्चाई खोजो
अप्पणा सच्चमेसेज्जा
स्वयं सत्यान्वेषण करना चाहिये
श्रुतधर्म एवं चारित्रधर्म
दुविहे धम्मे-सुयधम्मे चेव चरित्तधम्मे चेव
धर्म के दो रूप हैं – श्रुतधर्म (तत्त्वज्ञान) और चारित्रधर्म (नैतिकता)


















