माया मित्रता को नष्ट करती है
मित्रों का नाशक
सदा अमूढ़
जिसकी दृष्टि सम्यक् है, वह सदा अमूढ़ होता है
विग्रहवर्धक बात न कहें
विग्रह बढ़ानेवाली बात नहीं करनी चाहिये
बन्धनमुक्त नहीं हो सकता
गुरुजनों की अवहेलना करनेवाला कभी बन्धनमुक्त नहीं हो सकता|
गुरु विनय
तस्संतिए वेणइयं पउंजे
जिसके निकट रह कर धर्म के पद सीखे हों, उसके प्रति विनयपूर्ण व्यवहार रखना चाहिये
क्रोध का नाश
क्रोध को शान्ति से नष्ट करें
विषय-विरक्ति
वान्त पीना चाहते हो ? इससे तो तुम्हारा मर जाना अच्छा है
दूर से ही त्याग
कुशील (दुराचार) बढ़ानेवाले कारणों का दूर से ही त्याग करना चाहिये
पीठ का मांस न खायें
पीठ का मांस नहीं खाना चाहिये अर्थात् किसी की निन्दा उसकी अनुपस्थिति में नहीं करनी चाहिये
साधु-सम्पर्क
साधुओं से सम्पर्क रखना चाहिये
संगति पूरे जीवन को प्रभावित करती है| वह उन्नति के द्वार खोल देती है| एक कीट – कितना साधारण जीवन होता है उसका? परन्तु फूलों के साथ रहकर भगवान की मूर्ति के सिरपर जा पहुँचता है वह| एक छोटी नदी या नाला गंगा के साथ मिलकर कहॉं जा पहुँचता है? रत्नाकर समुद्र में| Continue reading “साधु-सम्पर्क” »


















