सव्वओ पमत्तस्स भयं,
सव्वओ अप्पमत्तस्स नत्थि भयं
सव्वओ अप्पमत्तस्स नत्थि भयं
मत्त को सब ओर से भय रहता है, किन्तु अप्रमत्त को किसी भी ओर से भय नहीं रहता
मत्त को सब ओर से भय रहता है, किन्तु अप्रमत्त को किसी भी ओर से भय नहीं रहता
शंकाशील व्यक्ति को कभी समाधि नहीं मिलती
आतुर परिताप देते हैं
मैं अकेला हूँ – मेरा कोई नहीं है और मैं भी किसी का नहीं हूँ
सबको जीवन प्रिय है, किसीके प्राणों का अतिपात नहीं चाहिये
हे पुरुष! तू सत्य को ही अच्छी तरह जान ले
मायावी और प्रमादी फिर से गर्भ में आते हैं
बुद्धिमान साधक लार चाटने वाला न बने अर्थात् परित्यक्त भोगों की पुनः कामना न करे