पावकम्मं नेव कुज्जा न कारवेज्जा
पापकर्म न स्वयं करना चाहिये और न दूसरों से कराना चाहिये
पापकर्म न स्वयं करना चाहिये और न दूसरों से कराना चाहिये
बाल (अज्ञानी या मूर्ख) की संगति नहीं करनी चाहिये
जो विचारपूर्वक बोलता है, वही निर्ग्रन्थ है
अपने समान ही बाहर (दूसरों को) देख
यहॉं मनुष्य विभिन्न रुचियों वाले हैं
मेधावी साधक को आत्मपरिज्ञान के द्वारा यह निश्चय करना चाहिये कि मैंने पूर्वजीवन में प्रमादवश जो कुछ भूल की है, उसे अब कभी नहीं करूँगा
जैसे पुण्यवान को कहा जाता है, वैसे ही तुच्छ को और जैसे तुच्छ को कहा जाता है, वैसे ही पुण्यवान को
जो एक अपने को नमा लेता है; वह बहुतों को नमा लेता है
वही वीर प्रशंसनीय बनता है, जो बद्ध को प्रतिमुक्त करता है
आतंकदर्शी पाप नहीं करता