उट्ठिए, नो पमायए
जो उत्थित हैं, वे प्रमाद न करें
मैं अकेला हूँ
एगे अहमसि, न मे अत्थि कोई,
न वाऽहमवि कस्स वि
न वाऽहमवि कस्स वि
मैं अकेला हूँ – मेरा कोई नहीं है और मैं भी किसी का नहीं हूँ
कठोर वाणी न बोलें
नो वयणं फरूसं वइज्जा
वाणी भी दो तरह की होती है – कठोर और कोमल| क्रोध और क्रूरता में वाणी कठोर निकलती है तथा विनय और शान्ति में कोमल | करुणा, दया, सहानुभूति, प्रेम, ममता, मोह, स्नेह और माया की वाणी कोमल होती है| इसके विपरीत निष्ठुरता, निर्दयता, द्वेष, क्रोध आदि में वाणी कठोर निकलती है| Continue reading “कठोर वाणी न बोलें” »
हिंसा न करें
सव्वेसिं जीवियं पियं,
नाइवाएज्ज कंचणं
नाइवाएज्ज कंचणं
सबको जीवन प्रिय है, किसीके प्राणों का अतिपात नहीं चाहिये
सच्चाई को जानिये
पुरिसा! सच्चमेव समभिजाणाहि
हे पुरुष! तू सत्य को ही अच्छी तरह जान ले
थूक न चाटें
से मइमं परिय मा य हु लालं पच्चासी
बुद्धिमान साधक लार चाटने वाला न बने अर्थात् परित्यक्त भोगों की पुनः कामना न करे
गर्भ में आते हैं
माई पमाई पुण एइ गब्भं
मायावी और प्रमादी फिर से गर्भ में आते हैं
समय को पहचानिये
अणभिक्कंतं च वयं संपेहाए,
खणं जाणाहि पंडिए
खणं जाणाहि पंडिए
हे बुद्धिमान साधक! अवशिष्ट आयु को देखते हुए समय को पहचान-अवसर का मूल्य समझ
श्रद्धा से टिके रहें
जाए सद्धाए निक्खंते,
तमेव अणुपालेज्जा विजहित्ता विसोत्तियं
तमेव अणुपालेज्जा विजहित्ता विसोत्तियं
जिस श्रद्धा के साथ निष्क्रमण किया है, उसी श्रद्धा के साथ विस्त्रोतसिका (शंका) छोड़कर उसका अनुपालन करना चाहिये
पाप न करें, न करायें
पावकम्मं नेव कुज्जा न कारवेज्जा
पापकर्म न स्वयं करना चाहिये और न दूसरों से कराना चाहिये


















