माई पमाई पुण एइ गब्भं
मायावी और प्रमादी फिर से गर्भ में आते हैं
मायावी और प्रमादी फिर से गर्भ में आते हैं
हे बुद्धिमान साधक! अवशिष्ट आयु को देखते हुए समय को पहचान-अवसर का मूल्य समझ
जिस श्रद्धा के साथ निष्क्रमण किया है, उसी श्रद्धा के साथ विस्त्रोतसिका (शंका) छोड़कर उसका अनुपालन करना चाहिये
पापकर्म न स्वयं करना चाहिये और न दूसरों से कराना चाहिये
बाल (अज्ञानी या मूर्ख) की संगति नहीं करनी चाहिये
जो विचारपूर्वक बोलता है, वही निर्ग्रन्थ है
अपने समान ही बाहर (दूसरों को) देख
यहॉं मनुष्य विभिन्न रुचियों वाले हैं
मेधावी साधक को आत्मपरिज्ञान के द्वारा यह निश्चय करना चाहिये कि मैंने पूर्वजीवन में प्रमादवश जो कुछ भूल की है, उसे अब कभी नहीं करूँगा
जैसे पुण्यवान को कहा जाता है, वैसे ही तुच्छ को और जैसे तुच्छ को कहा जाता है, वैसे ही पुण्यवान को