कम्ममूलं च जं छणं
जो क्षण है, वह कर्म का मूल है
जो क्षण है, वह कर्म का मूल है
कुशल व्यक्ति को प्रमाद नहीं करना चाहिये
शस्त्र एक से एक बढ़कर हैं, परन्तु अशस्त्र (अहिंसा) एक से एक बढ़कर नहीं है
न अपनी आशातना करो, न दूसरों की
अपने से बड़े गुरुजन (रत्नाधिक) जब बोलते हों – व्याख्यान करते हों, तब उनके बीच में नहीं बोलना चाहिये
जिसके आगे-पीछे न हो, उसके बीच में भी कैसे होगा?
हे पुरुष ! तू स्वयं ही अपना मित्र है| अन्य बाहर के मित्रों की चाह क्यों रखता है ?
जो सुप्त हैं, वे अमुनि है मुनि तो सदा जागते रहते हैं
जो अति मात्रा में अ-जल ग्रहण नहीं करता, वही निर्ग्रन्थ है
जो अनन्यदर्शी होता है, वह अनन्याराम होता है और जो अनन्याराम होता है, वह अनन्यदर्शी होता है