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भोगों का त्याग

भोगों का त्याग

उविच्च भोगा पुरिसं चयन्ति,
दुमं जहा खीणफलं व पक्खी

जैसे क्षीणफल वृक्ष को पक्षी छोड़ देते हैं, वैसे भोग क्षीणपुण्य पुरुष को छोड देते हैं

जब तक वृक्ष पर मधुर पके हुए फल होते हैं, तब तक दूर-दूर से पक्षी उसकी शाखाओं पर आ कर बैठते हैं और फलों का मन-चाहा उपभोग करते हैं; परन्तु जब सारे फल समाप्त हो जाते हैं और ऋतु बदल जाने से नये फल उत्प होने की सम्भावना नहीं रहती, तब सारे पक्षी उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं|

ठीक उसी प्रकार जब तक पुण्य का उदय होता है – प्रभाव होता है, तब तक प्राणियों के आसपास विविध भोग छाये रहते हैं – प्रत्येक इन्द्रिय को तृप्त करनेवाली, विषय सुख देनेवाली प्रचुर सामग्री प्राप्त होती रहती है – सारी सुविधाएँ मिलती रहती है – जंगल में भी उसके लिए मंगल का वातावरण पैदा हो जाता है, परन्तु जब पुण्य क्षीण हो जाते हैं, तब धीरे-धीरे समस्त भोग समाप्त हो जाते हैं – भोग व्यक्ति को छोड़कर चले जाते हैं| उनके स्वाद की स्मृति मात्र रह जाती है जो व्यक्ति को दुःखी बनाये रखती है|

समझदारी यह होगी कि पुण्यप्रताप से प्राप्त भोगसामग्री को भी हम परोपकार में लगाकर अपना परलोक सुधार लें|

- उत्तराध्ययन सूत्र 13/63

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