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न भाषा न पांडित्य

न भाषा न पांडित्य

न चित्ता तायए भासा
कुओ विज्जाणुसासणं

विचित्र (लच्छेदार) भाषाएँ भी (दुराचारी की दुर्गति से) रक्षा नहीं कर सकतीं, फिर विद्यानुशासन (पाण्डित्य) की तो बात ही क्या?

भाषाज्ञान और विद्यानुशासन में बहुत अन्तर है| एक आदमी एक ही भाषा जानता हो; फिर भी वह विद्यानुशासित अर्थात् पण्डित हो सकता है; परन्तु कोई अन्य आदमी अनेक भाषाओं का ज्ञाता होकर भी मूर्ख हो सकता है| भाषाओं की जानकारी से ज्ञान नहीं बढ़ता| इंग्लिश जिनकी मातृभाषा है, उन माता-पिताओं के बालक बचपन में भी अच्छी इंग्लिश समझ लेते हैं – बोल लेते हैं, परन्तु इसी कारण वे उस भारतीय विद्वान से अधिक विद्वान नहीं हो जाते, जो इंग्लिश बिल्कुल नहीं जानता|

इससे स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञान की वृद्धि का सम्बध भाषा से नहीं; बल्कि साहित्य से है| जो जितना अधिक साहित्य पढ़ेगा, वह उतना अधिक विद्वान होगा; परन्तु जहॉं तक दुर्गति से बचने का सवाल है वहॉं न भाषाज्ञान काम आता है और न पांडित्य ही|

दुर्गति से आत्मा की रक्षा करने वाली वस्तुएँ हैं – सुशीलता, चरित्रपरायणता, परोपकारिता आदि; भाषा या पांडित्य नहीं|

- उत्तराध्ययन सूत्र 6/11

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1 Comment

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  1. Jashvant Shah
    मार्च 4, 2013 #

    Jai jinendra. Here it not the language that is referred to Chita. Here a very important difference is cited between Vidya and Knowledge.According to my thinking the question of language in terms of either English or any other language is not here.

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