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सदाचार का मूल

सदाचार का मूल

नादंसणिस्स नाणं, नाणेण विणा न होंति चरणगुणा

सम्यग्दर्शन के अभाव में ज्ञान प्राप्त नहीं होता और ज्ञान के अभाव में चारित्र-गुण प्राप्त नहीं होते

दृष्टि यदि सम्यक् न हो तो मनुष्य सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता; क्यों कि जबतक दृष्टि सम्यक् परक नहीं होगी, सम्यक् की खोज नहीं की जा सकेगी और इसके लिए आवश्यक होगा कि दृष्टि स्वयं भी सम्यक् हो| सम्यग्ज्ञान से पहले सम्यग्दर्शन होना चाहिये| दर्शन किये बिना ज्ञान नहीं हो सकता| मन्दिर में महावीर स्वामी की तेजस्वी शान्त मुद्रा को देखकर ही जाना जा सकता है कि मनोविकारों पर विजय कैसे पाई जाती है? बच्चा भी प्रत्येक वस्तु देखकर ही सीखता है| ‘देखो और सीखो’ – शिक्षाशास्त्र का एक सर्व सम्मत सिद्धान्त है|

ज्ञान के बाद आचरण में शुद्धि आती है| जब हमें यह ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि अच्छा आचरण क्या होता है और बुरा आचरण क्या, तब अपने-आप अच्छे आचरण को जीवन में धारण करने की मनोवृत्ति उत्पन्न हो जाती है और हम सदाचारी बन जाते हैं|

इस प्रकार दर्शन से ज्ञान और ज्ञान से चारित्र के गुण प्राप्त होते हैं| सदाचार के मूल में सम्यग्दर्शन होता है|

- उत्तराध्ययन सूत्र 28/30

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