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सहिष्णुता

सहिष्णुता

पियमप्पियं सव्वं तितिक्खएज्जा

प्रिय हो या अप्रिय-सबको समभाव से सहना चाहिये

सदा प्रिय वस्तुओं का ही संयोग नहीं होता – सर्वत्र प्रशंसा ही प्राप्त नहीं होती – सभी लोक कोमल मीठे वचन ही नहीं बोला करते; किन्तु हमें अनेक बार अप्रिय वस्तुएँ भी प्राप्त होती हैं – हमारी निन्दा भी होती है – कठोर शब्दों को सुनने का अवसर आता है; सबकुछ समभावपूर्वक हमें सहना चाहिये – ऐसा वीतरागदेवों का आदेश है| सहिष्णुता वीरता का प्रतीक है और असहिष्णुता कायरता का|

भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, दंश (डॉंस-मच्छरों का डंक) वस्त्राभाव, आक्रोश, वध-याचना, कठोर शैया आदि बाईस परीषहों को शान्तिपूर्वक सहन करनेवाले श्रमण ही अपनी साधना में सफलता पाया करते हैं|

गृहस्थों के जीवन में भी कदम-कदम पर सहिष्णुता की आवश्यकता होती है| क्षुब्ध होना या क्रुद्ध होना दो बहुत सरल कार्य हैं – अपनी अदूरदर्शिता व मूर्खता से कोई भी व्यक्ति अशान्त हो सकता है; परन्तु दूरदर्शी सुज्ञ पुरुष क्षोभ के कारण उपस्थित होने पर भी क्षुब्ध नहीं होते| समभाव और सहिष्णुता का सर्वत्र वे परिचय देते हैं|

- उत्तराध्ययन सूत्र 21/15

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