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प्रमाद मत कर

प्रमाद मत कर

समयं गोयम ! मा पमायए

हे गौतम! तू क्षण भर के लिए भी प्रमाद मत कर

गौतमस्वामी को, जो महावीर स्वामी के प्रधान शिष्य थे – प्रधान गणधर थे, यह प्रेरणा दी गई थी कि आत्मकल्याण के मार्ग में चलते हुए क्षण भर के लिए भी तू प्रमाद मत कर|

ढाई हजार वर्ष पहले दी गई वह प्रेरणा शास्त्रों के माध्यम से आज हमें भी अनायास उपलब्ध हो गई है| कितनी महत्त्वपूर्ण है वह!

सावधानी प्रमाद का विलोम शब्द है| जीवन का ऐसा कौनसा क्षेत्र है, जिसमें प्रयाण करते हुए व्यक्ति को सावधानी रखने की आवश्यकता न हो? कोई नहीं|

सदा सर्वत्र सावधान रहनेवाला साधक ही अपनी साधना में सफलता का मुँह देख पाता है अर्थात् अपने लक्ष्य तक – अपनी मंजिल तक पहुँच पाता है|

जो सावधान नहीं रहता, उसे हम प्रमादी कहते हैं| प्रमादी समय का मूल्य नहीं समझता| वह भूल जाता है कि जो समय बीत जाता है, वह लौट कर नहीं आता| प्रमाद एक ऐसा अपराध है, जिसका कुफल तत्काल मिलता है – इसी जीवन में दिखाई देता है| अतः क्षण भर के लिए भी प्रमाद न करने की सलाह दी गई है|

- उत्तराध्ययन सूत्र 10/34

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