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मैत्री करो

मैत्री करो

मेत्तिं भूएसु कप्पए

प्राणियों से मैत्री करो

क्रोध, मान, माया और लोभ – ये चार कषाय आत्मा को उद्विग्न करते हैं – अशान्त बनाते हैं; इतना ही नहीं, बल्कि जिनके प्रति उनका प्रयोग किया जाता है, उन्हें भी उद्विग्न एवं अशान्त बना देते हैं| अपने कषाय के प्रदर्शन से उद्विग्न बने हुए दूसरे लोग हमारे वैरी बन जाते हैं और हम से वैर करते हैं – बदले में हम भी उनसे वैर करते है और इस प्रकार वैर प्रबल से प्रबलतर होता जाता है|

आनन्द वैर में नहीं, मित्रता में निवास करता है | यदि हम दूसरों के सामने मित्रता का हाथ बढ़ाते हैं; तो दूसरे भी हमारे सामने मित्रता का हाथ अवश्य बढ़ायेंगे| मित्र बनाने के बाद मित्रों के साथ यदि हम मैत्रीपूर्ण व्यवहार करते रहेंगे; तो दूसरे भी हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे| इस प्रकार पारस्परिक मैत्री दिन दूनी – रात चौगुनी बढ़ती ही रहेगी|

ज्यों-ज्यों मित्र बढ़ते जायेंगे और मित्रता प्रगाढ़ होती जायेगी, त्यों-त्यों परस्पर सहयोग और आनन्द में भी क्रमशः वृद्धि होती रहेगी|

इसीलिए हितैषी महान वीतराग देवों ने आदेश दिया है कि समस्त प्राणियों से मैत्री करो|

- उत्तराध्ययन सूत्र 6/2

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