post icon

अज्ञ अभिमान करते हैं

अज्ञ अभिमान करते हैं

बालजणो पगभई

अज्ञ अभिमान करते हैं

विद्या से विनय पैदा होना चाहिये| बिना विनय के विद्या में वृद्धि नहीं होगी और प्राप्त विद्या भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगेगी| विनय से ही विद्या की शोभा होती है| अतः अपनी विद्वत्ता की शोभा के लिए भी इस विनय नामक गुण को अपनाने की आवश्यकता है|

ज्ञान ऐसा समुद्र है कि उसमें जितनी गहरी डुबकी लगाओ, वह उतना ही अधिक गहरा मालूम होता है| अतः ज्ञान का कोई व्यक्ति घमण्ड नहीं कर सकता| घमण्ड वैसे भी बुरा है – एक कषाय है – आत्मा को कलुषित करने वाला है; फिर अन्य वस्तुओं के घमण्ड की अपेक्षा ज्ञान का घमंड तो और भी बुरा है, क्यों कि ज्ञान के घमण्ड से आत्मा का पतन शीघ्र होता है|

यह सदा स्मरणीय है कि ज्ञान एक पवित्र वस्तु है और अभिमान अपवित्र; इसलिए जिसे अभिमान का ज्ञान होता है, वह ज्ञान का अभिमान नहीं कर सकता|

जो व्यक्ति ज्ञान का जितना अधिक अभिमान करता है, वह उतना ही अधिक अनभिज्ञ है – अज्ञ है| ज्ञानियों का कथन है कि बालजन या अज्ञजन ही अपने आपको बहुत बड़ा समझते हैं – अभिमान करते हैं|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/11/2

Did you like it? Share the knowledge:


Advertisement

2 Comments

Leave a comment
  1. V D MEHTA
    मार्च 1, 2016 #

    More in Hindi or Gujarati

  2. V D MEHTA
    मार्च 1, 2016 #

    Hindi or Gujarati

Leave a Reply

Connect with Facebook

OR