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निष्प्रयोजन हिंसा

निष्प्रयोजन हिंसा

अट्ठा हणंति, अणट्ठा हणंति

कुछ लोग प्रयोजन से हिंसा करते हैं और कुछ लोग बिना प्रयोजन ही

बहुत-से लोगों की यह आदत होती है कि यों ही चलते-चलते रास्ते में आये किसी पौधे को उखाड़ कर फैंक देते हैं – फूल को तोड़ कर मसल देते हैं – पेड़ की टहनी तोड़ कर हाथ में रख लेते हैं और कुछ दूर जाकर फैंक देते हैं| बहुत-सी महिलाएँ ऐसी होती हैं कि यों ही खड़ी-खड़ी अपने पॉंव के अंगूठे से जमीन कुरेदती रहती हैं| इस प्रकार बिना किसी प्रयोजन के वनस्पतिकाय एवं पृथ्वीकाय की हिंसा होती रहती है|

बहुत-से छात्र तालाब के किनारे बैठकर पानी में पत्थर फैंकते हैं और उससे उठने वाली और किनारे तक आनेवाली गोलगोल लहरों को देखने का आनन्द लेते हैं; परन्तु उन्हें यह भान नहीं रहता कि उस पत्थर के प्रहार से जल के कितने जन्तु मर जाते हैं या घायल हो जाते हैं|

इसके विपरीत कुछ लोग प्रयोजन से हिंसा करते हैं – जैसे दतौन के लिए टहनी तोड़ना, शारीरिक स्वच्छता के लिए स्नान करना, सॉंस लेना आदि, वैसे तो हिंसा स्वयं पाप है; परन्तु सप्रयोजन हिंसा की अपेक्षा निष्प्रयोजन हिंसा में पाप अधिक है|

- प्रश्‍नव्याकरण 1/1

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